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कपालकुण्डला
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या पीछे पलटकर भागें; कुछ भी समझ न सके। उन्होंने कापालिकों की बात सुनी थी। समझ गये कि यह व्यक्ति भयानक कापालिक ही है।

जिस समय नवकुमार यहाँ पहुँचे, उस समय यह कापालिक जप या ध्यानमें मग्न था। नवकुमारको देखकर उसने भ्रूक्षेप भी नहीं किया। बहुत देरके बाद उसने पूछा—“कस्त्वम्?”

नवकुमारने उत्तर दिया—“ब्राह्मण।”

कापालिकने फिर कहा,—“विष्ठ।”

यह कहकर वह उसी प्रकार अपनी क्रिया में संलग्न रहा। नवकुमार भी बैठे नहीं, बल्कि खड़े ही रहे।

इस तरह कोई आधा प्रहर बीत गया। जपके अन्तमें कापालिकने आसनसे खड़े होकर उसी तरह संस्कृत भाषामें कहा—“मेरे पीछे-पीछे चले आओ।”

यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि और कोई समय होता तो नवकुमार कभी इसके साथ न जाते। किन्तु इस समय उनके प्राण भूख और प्याससे कण्ठमें आ लगे थे, अतः उन्होंने कहा—“प्रभुकी जैसी आज्ञा। लेकिन मैं भूख और प्याससे बहुत कातर हूँ, बताइये बहाँ जानेसे मुझे आहारार्थं वस्तु मिलेगी?”

कापालिकने कहा—“तुम भैरवी प्रेरित हो, मेरे साथ आओ; खानेको भोजन पाओगे।”

नवकुमार कापालिकके अनुगामी हुये। दोनों बहुत दूरतक साथ गये। राहमें बनमें कोई बात न हुई। अन्तमें एक पर्णकुटीर मिली। कापालिकने उसमें प्रवेशकर पीछे नवकुमारको आनेका आदेश दिया। इसके उपरान्त कापालिकने नवकुमारसे अबोधगम्य तरकीबसे एक लकड़ी जलाई। नवकुमारने उस रोशनीमें