पृष्ठ:कटोरा भर खून.djvu/९

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बदली छाई हुई, तीसरे दुपट्टी घने पेड़ों की छाया ने पूरा अन्धकार कर रक्खा था । मगर बीरसिंह बराबर कदम बढ़ाये चला जा रहा था । जब बाग की हद्द से दूर निकल गया तो यकायक पीछे किसी आदमी के आने की आहट पाकर रुका और फिर कर देखने लगा । मगर कुछ मालूम न पड़ा, लाचार पुन: आगे बढ़ा परन्तु चौकन्ना रहा क्योंकि उसे दुश्मन के पहुंचने और धोखा देने का पूरा गुमान था । आखिर थोड़ी दूर और आगे बढ़ने पर वैसा ही हुआ । बांए तरफ से झपटता हुआ एक आदमी आया और उसने अपनी तलवार से बीरसिंह का काम तमाम करना चाहा, मगर न हो सका क्योंकि वह पहिले ही से सम्हला हुआ था । हां एक हलका-सा घाव जरूर लगा जिसके साथ ही उसने भी तलवार खैंच कर सामना किया और ललकारा । मगर अफसोस, उसके ललकार की आवाज ने उलटा ही असर किया अर्थात् दो आदमी और निकल आये जो थोड़ी ही दूर पर एक पेड़ की आड़ में छिपे हुए थे । अब तीन आदमियों से उसे मुकाबला करना पड़ा ।

बीरसिंह बेशक बहादुर आदमी था तथा उसके अंगों में ताकत के साथ-ही- साथ चुस्ती और फुर्ती भी थी । तलवार, बाँक, पटा और खंजर इत्यादि चलाने में वह पूरा ओस्ताद था । खराब-से-खराब तलवार भी उसके हाथ में पड़कर जौहर दिखाती थी और दो-एक दुश्मन को जमीन पर गिराये बिना न रहती थी ।

इस समय उसकी जान लेने पर तीन आदमी मुस्तैद थे । तीनों आदमी तीन तरफ से तलवार चला रहे थे, मगर वह किसी तरह न सहमा और बेधड़क तीनों आदमियों की तलवारों को खाली देता और अपना वार करता था । थोड़ी ही देर में उसकी तलवार से जख्मी होकर एक आदमी जमीन पर गिर पड़ा । अब केवल दो आदमी रह गये पर उनमें से भी एक बहुत ही सुस्त और कमजोर हो रहा था । लाचार वह अपनी जान बचाकर सामने से भाग गया । अब सिर्फ एक आदमी उसके मुकाबले में रह गया । बेशक यह लड़ाका था और इसने आधे घण्टे तक अच्छी तरह से बीरसिंह का मुकाबला किया बल्कि इसके हाथ से बीरसिंह के बदन पर कई जख्म लगे, मगर आखिर को बीरसिंह के अन्तिम वार ने उसका सर धड़ से अलग करके फेंक दिया और वह हाथ-पैर पटकता हुआ जमीन पर दिखाई देने लगा ।

अपने दुश्मन के मुकाबले में फतह पाने से बीरसिंह को खुश होना था मगर ऐसा न हुआ । हरारत मिटाने के लिए थोड़ी देर को वह एक पेड़ के नीचे बैठ गया