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खड़ग॰: (नाहरसिंह से) हाँ, आपने कहा था कि बाबाजी ने तुमसे मिलना मंजूर कर लिया, घण्टे-दो घण्टे में यहाँ जरूर आवेंगे, मगर अभी तक आए नहीं।

नाहर॰: वे जरूर आवेंगे।

इतने ही में दरबान ने आकर अर्ज किया कि 'एक साधु बाहर खड़े हैं जो हाजिर हुआ चाहते हैं।' इतना सुनते ही खड़गसिंह उठ खड़े हुए और सभों की तरफ देख कर बोले, "ऐसे परोपकारी महात्मा की इज्जत सभों को करनी चाहिए।"

सब-के-सब उठ खड़े हुए और आगे बढ़कर बड़ी इज्जत से बाबा जी को ले आये और सबसे ऊँचे दर्जे पर बिठाया।

बाबा: आप लोग व्यर्थ इतना कष्ट कर रहे हैं! मैं एक अदना फकीर, इतनी प्रतिष्ठा के योग्य नहीं हूँ।

खड़ग॰: यह कहने की कोई आवश्यकता नहीं, आपकी तारीफ नाहरसिंह की जुबानी जो कुछ सुनी है मेरे दिल में है।

बाबा: अच्छा, इन बातों को जाने दीजिए और यह कहिए कि दर्बार के लिए जो कुछ बन्दोबस्त आप लोग किया चाहते थे वह हो गया या नहीं?

खड़ग॰: सब दुरुस्त हो गया, कल रात को राजा के बड़े बाग में दर्बार होग।

बाबा: मेरी भी इच्छा होती है कि दर्बार में चलूँ।

खड़ग॰: आप खुशी से चल सकते हैं, रोकने वाला कौन है?

बाबा: मगर इस जटा, दाढ़ी-मूँछ और मिट्टी लगाए हुए बदन से वहाँ जाना बेमौके होगा।

खड़ग॰: कोई बेमौके न होगा।

बाबा: क्या हर्ज होगा अगर एक दिन के लिए मैं साधु का भेष छोड़ दूँ और सरदारी ठाठ बना लूँ।

खड़ग॰: (हँस कर) इसमें भी कोई हर्ज नहीं! साधु और राजा समान ही समझे जाते हैं!!

बाबा: और तो कोई कुछ न कहेगा मगर नाहरसिंह से चुप न रहा जायगा।

नाहर॰: (हाथ जोड़ कर) मुझे इसमें क्यों उज्र होगा?

बाबा: क्यों का सबब तुम नहीं जानते और न मैं कह सकता हूँ मगर इसमें कोई शक नहीं कि जब मैं अपना सरदारी ठाठ बनाऊँगा तो तुमसे चुप न रहा जायगा।