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पास तक मै पीछे-पीछे गया, फिर लौट आया।

राजा: अब तो बात हद्द से ज्यादा हो गई! (जोश में आकर) खैर, क्या हर्ज है, समझ लूँगा। उन कम्बख्तों को मैं कब छोड़ने वाला हूँ, अब तो खड़गसिंह पर भी खुल्लमखुल्ला इलजाम लगाने का मौका मिला। अच्छा, सेनापति को बुलाओ, बहुत जल्द हाजिर करो।

शम्भू॰: बहुत खूब।

राजा: नहीं नहीं, ठहरो, आने-जाने में देर होगी, मैं खुद चलता हूँ, तुम दोनों भी मेरे साथ चलो।

शम्भू॰: जो हुक्म।

राजा ने अपने कपड़े दुरुस्त किए, हर्ब लगाए, और चल खड़ा हुआ। दोनों मुस हब उसके साथ हुए।

वह सदर ड्योढ़ी पर पहुँचा, तीन सवारों के घोड़े ले लिये और उन्हीं पर सवार होकर तीनों आदमी उस तरफ रवाना हुए जिधर राजा की फौज रहती थी। घोड़ा फेंकते हुए ये तीनों आदमी बहुत जल्द वहाँ पहुँचे और सेनापति के बैंगले के पास आकर खड़े हो गए।

सेनापति को राजा के आने की खबर की गई, वह बेमौके राजा के आने पर जो एक नई बात थी, ताज्जुब करके घबड़ाया हुआ बाहर निकल आया और हाथ जोड़ कर राजा के पास खड़ा हो गया। राजा और उसके मुसाहब घोड़े से नीचे उतरे और सेनापति के साथ बंगले के अन्दर चले गये; वहाँ के पहरे वालों ने घोड़ा थाम लिया।

घण्टे-भर तक ये लोग बंगले के अन्दर रहे, न-मालूम क्या-क्या बातें होती रहीं और किस-किस तरह का बन्दोबस्त इन लोगों ने विचारा। खैर, जो कुछ होगा मौके पर ही देखा जाएगा। घण्टे-भर बाद राजा बंगले के बाहर निकला और मुसाहबों के साथ अपने घर पहुँचा। सुबह की सुफेदी आसमान पर फैल चुकी थी। वह रात-भर का जागा हुआ था, आँखें भारी हो रही थीं, पलंग पर जाते ही नींद आ गई और पहर दिन चढ़े तक सोया रहा।

जब करनसिंह राठू की आँख खुली तो वह बहुत उदास था। उसके जी की बेचैनी बढ़ती ही जाती थी, रात की बातें एक पल के लिए उसके दिल से दूर न होती थीं। थोड़ी देर तक वह किसी सोच-विचार में बैठा रहा, आखिर उठा और