पृष्ठ:कटोरा भर खून.djvu/७०

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वह बहुत दिनों तक मेरे घर में रही, एक लड़की और उसके बाद एक लड़का भी पैदा हुआ। तब तक राजा को सुन्दरी का पता न लगा मगर वह खोज लगाता ही रहा, आखिर मालूम होने पर उसने सुन्दरी को चुरा मँगाया और उसके साथ जिस तरह का बर्ताव किया आप बहादुर विजयसिंह की जुबानी सुन ही चुके हैं। बेचारी लड़की जिस तरह से मारी गई उसे याद करने से कलेजा फटता है। सुन्दरी को राजी करने के लिए राजा ने बहुत-कुछ उद्योग किया मगर उस बेचारी ने अपना धर्म न छोड़ा। आखिर राजा ने उसे गुप्त रीति से किले के अन्दर के एक तहखाने में बन्द किया और उसकी लड़की का खून एक कटोरे में भरकर और मसाले से जमा कर एक चौकी पर उसके सामने रख दिया जिसमें वह दिन-रात उसे देखा करे और कुढ़ा करे। आप लोग खूब समझ सकते हैं कि उस बेचारी की क्या हालत होगी और उस कटोरे-भर खून की तरफ देख-देख कर उसके दिल पर क्या गुजरती होगी, मगर वाह रे सुन्दरी! फिर भी उसने अपना धर्म न छोड़ा!!

बाबू साहब ने इतना ही कहा था कि सभों के मुंह से "वाह रे सुन्दरी, शाबास, शाबास! धर्म पर दृढ़ रहने वाली औरत तेरे ऐसी कोई काहे को होगी!" की आवाज आने लगी। बाबू साहब ने फिर कहना शुरू किया-

बाबू साहब॰: जब सुन्दरी कैदखाने में बेबस की गई तो कई लौंडियाँ उसकी हिफाजत के लिए छोड़ी गयीं। उनमें से एक लौंडी सुन्दरी पर दया करके और अपनी जान पर खेल के वहां से निकल भागी। उसने मेरे पास पहुँच कर सब हाल कहा और अन्त में उसने सुन्दरी का यह संदेसा मुझे दिया कि लड़के को लेकर तुम्हें एक नजर देखने के लिए बुलाया है, जिस तरह बने आकर मिलो! सुन्दरी का हाल सुन मेरा कलेजा फट गया। मैं इस शहर में आया और उससे मिलने का उद्योग करने लगा। इस फेर में बरस-भर से ज्यादा बीत गया, बहुत-सा रुपया खर्च किया और कई आदमियों को अपना पक्षपाती बनाया, आखिर दो ही चार दिन हुए हैं कि किसी तरह छोटे बच्चे को, जो नालायक राजा के हाथ से बच गया और मेरे पास था, लेकर किले के अन्दर तहखाने में गया और उससे मिला, कैदखाने में उसकी जैसी अवस्था मैंने देखी, कह नहीं सकता। इत्तिफाक से उसी दिन नाहरसिंह ने बीरसिंह को कैदखाने से छुड़ाया था और यह हाल मुझे मालूम था बल्कि बीरसिंह के छुड़ाने की खबर कई पहरे