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सभों को कायल करके फाँसी का हुक्म दूँगा, वे लोग भी ताज्जुब करेंगे कि किस तरह उनके दिल का भेद ले लिया गया।

खड़गसिंह जब यकायक दीवानखाने में राजा के सामने जा पहुँचे तो राजा बहुत ही घबड़ाया और डरा, मगर उसने तुरंत अपने को सँभाला और जी में सोचा कि खड़गसिंह के साथ जाहिरदारी करनी चाहिए, अगर मौका देखूँगा तो इसी समय इन्हें भी खपा कर बखेड़ा तै करूँगा, किसी को कानोंकान खबर भी न होगी।

उधर खड़गसिंह के दिल में भी यकायक यही बात पैदा हुई। उसने सोचा कि मैं केवल तीन आदमी साथ लेकर यहाँ आ पहुँचा सो ठीक न हुआ। कहीं ऐसा न हो कि राजा मेरे साथ दगा करे, क्योंकि अभी थोड़ी ही देर हुई है, इस बात का पता लग चुका है कि कमेटी में एक आदमी राजा का पक्षपाती भी धोखा देकर घुसा हुआ है, उसकी जुबानी मेरी कुल कार्रवाई राजा को मालूम हो गई होगी। ताज्जुब नहीं कि वह इस समय दगा करे। इन बातों को सोचकर बुद्धिमान खड़गसिंह ने फौरन अपना ढंग बदल दिया और मतलब-भरी बातों के फेर में राजा को ऐसा फँसा लिया कि वह चूँ तक न कर सका। उसे विश्वास हो गया कि खड़गसिंह मेरा मददगार है, इससे किसी तरह का उज्र करना मुनासिब नहीं। उसने तुरत अपने आदमियों को हुक्म दिया कि बीरसिंह को उठाकर सेनापति खड़गसिंह के डेरे पर पहुँचा आओ। खड़गसिंह भी दीवानखाने के नीचे उतरे और सड़क पर पहुँच कर उन्होंने अपने साथी तीन बहादुरों में से दो को मरहम-पट्टी की ताकीद करके बीरसिंह के साथ जाने का हुक्म दिया तथा एक को अपने साथ लेकर उस तरफ बढ़े जहाँ नाहरसिंह को छोड़ आए थे।

उस मकान से, जिसमें कमेटी हुई थी, थोड़ी दूर इधर ही खड़गसिंह ने नाहरसिंह को पाया। इस समय नाहरसिंह अकेला न था। बल्कि पांच आदमी और भी उसके साथ थे जिन्हें देख खड़गसिंह ने पूछा, "कौन है, नाहरसिंह!" इसके जवाब में नाहरसिंह ने कहा, "जी हाँ।"

खड़ग॰: ये सब कौन हैं?

नाहर॰: मेरे साथियों में से जो इधर-उधर घूम रहे थे और इस इन्तजार में थे कि समय पड़ने पर मदद दें।

खड़ग॰: इतने ही हैं या और भी?