पृष्ठ:कटोरा भर खून.djvu/२९

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जाकर कैद करो, हम परसों आवेंगे तब जो कुछ मुनासिब होगा, किया जायगा ।" माझियों ने वैसा ही किया और अब किनारे पर सिर्फ ये ही दोनों आदमी रह गए ।


 

किनारे पर जब केवल नाहरसिंह और बीरसिंह रह गए तब नाहरसिंह ने वह चीठी पढ़ी जो रामदास की कमर से निकली थी । उसमें यह लिखा हुआ था: मेरे प्यारे दोस्त,

अपने लड़के के मारने का इलजाम लगा कर मैंने बीरसिंह को कैदखाने में भेज दिया । अब एक-ही-दो दिन में उसे फांसी देकर आराम की नींद सोऊंगा । ऐसी अवस्था में मुझे रिआया भी बदनाम न करेगी । बहुत दिनों के बाद यह मौका मेरे हाथ लगा है । अभी तक मुझे मालूम नहीं हुआ कि रिआया बीरसिंह की तरफदारी क्यों करती है और मुझसे राज्य छीन कर बीरसिंह को क्यों दिया चाहती है ? जो हो, अब रिआया को भी कुछ कहने का मौका न मिलेगा । हां, एक नाहरसिंह डाकू का खटका मुझे बना रह गया, उसके सबब से मैं बहुत ही तंग हूं । जिस तरह तुमने कृपा करके बीरसिंह से मेरी जान छुड़ाई, आशा है कि उसी तरह से नाहरसिंह की गिरफ्तारी की भी तर्कीब बताओगे

तुम्हारा सच्चा दोस्त
 
करनसिंह ।
 

इस चीठी के पढ़ने से बीरसिंह को बड़ा ही ताज्जुब हुआ और उसने नाहरसिंह की तरफ देख कर कहा :

बीर० : अब मुझे निश्चय हो गया कि करन सिंह बड़ा ही बेईमान और हरामजादा आदमी है । अभी तक मैं उसे अपने पिता की जगह समझता था और उसकी मुहब्बत को दिल में जगह दिए रहा । आज तक मैंने उसकी कभी कोई बुराई नहीं की फिर भी न-मालूम क्यों वह मुझसे दुश्मनी करता है । आज तक में उसे अपना हितू समझे हुए था मगर...

नाहर० : तुम्हारा कोई कसूर नहीं, तुम नहीं जानते कि तुम कौन हो अं करनसिंह कौन है ! जिस समय तुम यह सुनोगे कि तुम्हारे पिता को करनसिंह