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एक घूँट


कामना और प्राप्ति के उपायों की क्रीड़ा से विरत होकर एक सुन्दर जीवन, शान्त जीवन बिता देने के लोभ से मैंने झाडू लगाना स्वीकार किया है; विद्यालय की परीक्षा और उपाधि को भुला दिया है तब तुम मेरी स्त्री होकर...

झा॰ की स्त्री––बस-बस, मैं अब तुमसे कुछ न कहूँगी; मेरी भूल थी। अच्छा तो मैं जाती हूँ।

झाड़ूवाला––मैं भी चलता हूँ––(दोनों का प्रस्थान।)

वनलता––यही तो, इसे कहते हैं झगड़ा, और यह कितना सुखद है, एक दूसरे को समझकर जब समझौता करने के लिये, मनाने के लिये, उत्सुक होते हैं तब जैसे स्वर्ग हँसने लगता है––हाँ, इसी भीषण संसार में। मैं पागल हूँ। (सोचती हुई करुण मुखमुद्रा बनाती है, फिर धीरे-धीरे सिसकने लगती है) वेदना होती है। व्यथा कसकती है। प्यार के लिये। प्यार करने के लिये नहीं, प्रेम पाने के लिये। विश्व की इस अमूल्य सम्पत्ति में क्या मेरा अंश नहीं। इन असफलताओं के संकलन में मन को बहलाने के लिये, जीवन-यात्रा में थके हृदय के सन्तोष के लिये कोई अवलम्ब नहीं। मैं प्यार करती हूँ और प्यार करती रहूँ; किन्तु मुझे मानवता के नाते.......इसे सहने के लिये मैं कदापि प्रस्तुत नहीं। आह! कितना तिरस्कार है। (वनलता सिर झुकाकर सिसकने लगती है। आनन्द का प्रवेश)

आनन्द––आप कुछ दुखी हो रही हो––क्यों?

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