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एक घूँट


आँख मूँदकर आनन्द न लूँगा––आप ही कहिये? आपने व्याह किया है तो!

आनन्द––(डाँटते हुए) मैंने व्याह नहीं किया है; किन्तु इतना मैं कह सकता हूँ कि आनन्द को इस गड़बड़ झाला में घोटना ठीक नहीं। अन्तरात्मा के उस प्रसन्न-गम्भीर उल्लास को इस तरह कदर्थित करना अपराध है।

चँदुला––कदापि नहीं, एक घूँट सुधारस पान करके देखिये तो, वही भीतर की सुन्दर प्रेरणा आपकी आँखों में, कपोलों पर, सब जगह, चाँदनी-सी खिल जायगी। और सम्भवतः आप व्याह करने के लिये.........

रसाल––(डाँटकर) अच्छा बस, अब जाइए।

चँदुला––(झुककर) जाता हूँ। किन्तु इस सेवक को न भूलियेगा। सुधारस भेजने के लिये शीघ्र ही पत्र लिखियेगा। मैं प्रतीक्षा करूँगा।(जाता है)

(कुछ लोग गम्भीर होकर निश्वास लेते हैं जैसे प्राण बचा हो, और कुछ हँसने लगते हैं)

रसाल––(निश्वास लेकर) ओह! कितना पतन है? कितना वीभत्स! कितना निर्दय! मानवता! तू कहाँ है?

आनन्द––आनन्द में, मेरे कवि-मित्र! यह जो दुःखवाद का पचड़ा सब धर्मों ने, दार्शनिकों ने गाया है उसका रहस्य क्या

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