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एक घूँट


गला बाँधकर एक दूसरे पर विश्वास करते हुए, सन्तुष्ट दो प्राणियों की आशाजनक परिस्थिति क्या छोड़ देने की वस्तु है? फिर......

प्रेमलता––(स्वगत) यह कितनी निराशामयी शून्य कल्पना है––(आनन्द को देखने लगती है)।

आनन्द––(हताश होने की मुद्रा बनाकर) ओह! मनुष्य कभी न समझेगा। अपने दुःखों से भयभीत कंगाल दूसरों के दुःख में श्रद्धावान बन जाता है।

मुकुल––मैंने देखा है कि मनुष्य एक ओर तो दूसरे से ठगा जाता है, फिर भी दूसरे से कुछ ठग लेने के लिये सावधान और कुशल बनने का अभिनय करता रहता है।

प्रेमलता––ऐसा भी होता होगा!

आनन्द––यह मोह की भूख......

वनलता––(पास आकर) और पेट को ही भूख-प्यास तो मानव-जीवन में नहीं होती। हृदय को––(छाती पर हाथ रखकर) कभी इसको––भी टटोलकर देखा है। इसकी भूख-प्यास का भी कभी अनुभव किया है? (आनन्द कौतुक से वनलता की ओर देखने लगता है। आश्रम के मन्त्री कुंज के साथ रसाल का प्रवेश)

आनन्द––(मुस्कराकर) देवि, तुम्हारा तो विवाहित जीवन

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