पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/१३५

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अनि०--हां, तेरी अभिमान रूपी रात्रि का अंत करके अब यह ऊषा रूपी प्रकाश संसार के सामने भाता है, इसीलिए तुझे ऊषा का नाम नहीं सुहाता है।

बाणा०--ओ जिद्दी लड़के तू क्यों अपनी शामत बुलाता है ! ' नागपाश में बंधा रहने पर भी तू अनिरुद्ध कहाता है ?

अनि०--हाँ हाँ, नागपाश में बँधा रहने पर भी अनिरुद्ध अनिरुद्ध कहाता है !

वाणा०--घरे अनिरुद्ध का अर्थ तो स्वतंत्र है, परन्तु तू यहाँ परतंत्र दिखाता है :-

पड़के कारागार में स्वाधीन स्वर वेकार है ।
जिस्मपे नागों के फन्दे सरपे ये तल्वार है।

ऊषा--अगर उस सर पर तल्वार है तो ऊषा के जीवन पर भी धिक्कार है ! उस शीस के बदले यह शीस तल्वार की भेंट होने के लिए तैयार है :-

तल्वार का करना ही है तो वार कीजिए।
पुत्री को पहले, हे पिता बलिहार कीजिए।

वाणा०--अच्छा तो आज इस दुधारी तल्वार से तुम दोनों के सर उड़ाता हूं:--

[यह कहकर मारने को झपटना और उद्धव बलराम का आपहुंचना]