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वसंत चुप हो गया। वह रह रह कर अपनी ग़ल्ती पर पछता रहा था। वसंत ने साहस करके इस नाज़ुक विषय को छेड तो ज़रूर दिया था किन्तु वह डर रहा था कि कहीं कुसुम की नज़र से वह नीचे न गिर जाय। दोनों चुप थे। दोनों के दिमाग में एक प्रकार का तूफ़ान सा उठ रहा था। टहलते टहलते कुसुम जैसे थक कर एक संगमरमर की बेंच पर बैठ गई। उसने वसंत से भी बैठ जाने का इशारा किया। उसने कहा--"वसंत मैं तुम्हें कितना चाहती हूँ शायद तुम इसे अभी तक अच्छी तरह नहीं जान पाये हो?" वसंत के हृदय में फिर आशा चमक उठी, यह ध्यानपूर्वक उत्सुकता के साथ कुसुम की बात सुनने लगा।

कुसुम ने कहा--"तुम भी मुझे पहले से चाहते थे यह बात मुझ स छिपी न रह सकी, उस दिन ड्राइंगरूम में अपनेआप ही प्रकट हो गई, लेकिन यह प्रकट हुई बहुत देर के बाद, जय उसके लिए कोई उपाय शेष न था। उसके याद वसंत, इन लम्बे चार वर्षों की अवधि में भी मैं तुम्हें भूल नहीं सकी हूँ, जैसा कि तुम देख रहे हो।" वसंत का हृदय जोर से धडक रहा था। कुसुम ने फिर कहा--"इतना सब होते हुए भी, वसंत! मैंने निश्चय किया है कि मैं कभी पुनर्वि- वाह न करूँगी, अपने माता-पिता और अपने स्वामी की स्मृति में कलंक न लगाऊंगी, तुम्हारी ओर मेरा शुद्ध प्रेम है, उसमें वासना और स्वार्थ की गन्ध नहीं है।" बसंत हताश हो गया। कुसुम ने फिर कहा--"कहानियों की तरह क्या प्रेम का अन्त विवाह में ही होना चाहिए, बसंत?" बसंत कोई उत्तर न दे सका। उसने देखा कुसुम प्रेम की दौड में भी उससे बहुत आगे निकल गई है। बसंत अपने को स्वार्थी,