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उसके जीवन में कोई विशेष परिवर्तन न हुआ। उसके मामाने उसके विवाह के लिए दो चार यार कहा भी किन्तु वसन्त ने टाल दिया। माता पिता तो थे होनहीं जो उसेवारयार विवाह के लिए बाध्य करते । मिनों ने भी यदि कभी वसंत से इसकी चर्चा की तो वसन्त ने यात सदा हंसी में उड़ा दी । अपनी इस लापरवाही का कारण यह खुद न समझ सकता था। विवाह न करने की उसने कोई प्रतिज्ञा तो न कर रक्खी थी किन्तु फिर भी न जाने क्यों उसका चित्त नव्यवस्थित था, विवाह की भोर उसका झुकाव नहीं सा था।

इन चार वर्षों में वसन्त एक बार भी इलाहबाद नहीं गया, बार बार इच्छा होते हुए भी वह वहाँ न जा सका। उसके मामा की बदली लखनऊ की होगई थी। श्रय यह इलाहाबाद जाता भी तो किसके यहाँ?

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अपने क्लास के विद्यार्थियों को टाटानगर के कारखाने को दिखला कर जब वसन्त लौट रहा था तो उसे इलाहाबाद स्टेशन पर से जाना पड़ा। यहां एक दिन रुकने के प्रलोभन को यह न रोक सका, सामान स्टेशन पर छोड़ कर पहिले वह अपने पुराने साथियों से मिलने गया किन्तु एक दो को छोड़कर उसे और कोई न मिला। फिर वह जार्जटाउन की ओर गया, और उसके पैर अपने ही श्राप कुमुम के घर के पास जाकर ठिटक गये । दरवाजे पर वही पुराना चौकीदार बैठा हुअा हाथ पर तमापू मल रहा था । वसन्त को देखते ही वह उट कर खड़ा होगया; बोला-"वहुत दिन में पाये भैय्या?" और विना वसन्त के कहे हो अन्दर ख़बर देने के लिए चला