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है कि आज अपने विवाह की पहली वर्ष-गांठ है। इसको सुनकर प्रमोद जो वाक्य कह कर यहां-वहां से चला जाता है, पाठक उसे ध्यान से देखें-

"उंह, होगी।"

बस यही नपे-तुले दो शब्द यह कहता है। किन्तु इस वाग्यम में भी छाया के प्रति प्रमोद की जो तीव्र उपेक्षा, जो निर्मम उदासीनता, जो उम्र विरक्ति अभिव्यक्षित होगई है, वह वाग्बाहुल्य में भी सम्भवतः नहीं हो सकती है। फिर कितने स्वाभाविक ढंग पर ही यह व्यक्त की गई है। कला की सबसे बड़ी देनगी यही हो सकती है।

हास्य के दो-पक उदाहरण लीजिए। उन्मादिनी में हीना कहती है-

"किन्तु पिता जी तो चिट्ठी-पत्री से कुछ और ही तय कर रहे थे। सुना, कोई इग्लैंड से लौटे हुए इंजीनियर हैं जिनके साथ पिता जी जीवन भर के लिये मुझे बांध देना चाहते हैं। सोचा, मुझे कौनसी इमारत खड़ी करवानी है या कौनसा पुल पंधवाना है जो पिता जी ने इंजीनियर तलाश किया है",

पाठक देखें उपर्युक्त वाक्य-राशि निष्किय, रिक्त हास या क्षुद्रतापूर्ण, अनर्गल अट्टहास को जन्म नहीं देती। यह केवल विचारपूर्ण, गम्भीर स्मित को ही सृष्टि करती है। एक सामाजिक व्यवस्था, पक प्रचलित परिपाटी के प्रति असंतोष व्यक कर उसकी और हमारा ध्यान आकर्षित किया गया है। किन्तु उस कुरीति की आलोचना में-विवाह की अन्य प्रथा के उस विरोध में-जिस हास्य का उपयोग हुथा है उसमें भी निर्दोष, विनीत और भोली भावना ही