यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१४६


सी हुई। उससे रहा न गया, उठकर यह प्रमोद के घर की तरफ चली। जहां न जाना चाहती थी वहीं गई, जो कुछ न करना चाहती थी वही किया। घर के सामने पहुँच कर उसने देखा कि चन्द्रभूषण तख्त पर बैठे हैं। छाया को देखते ही यह कुछ स्तम्भित से हुए, किन्तु तुरंत ही श्रादर का भाव प्रदर्शित फरते हुए घोल उठे—

"आओ बेटी कैसे आई हो आओ बैंठो।"

छाया को ससुर से इस सद्व्यवहार की आशा न थी। घह उनके इस व्यवहार पर पड़ी प्रसन्न हुई। किन्तु उसकी समझ में न आता था कि वह प्रमोद के विषय में कैसे पूछे। इसी पशोपेश में वह कुछ देर तक चुपचाप खड़ी रही। अंत में अपने सारे साहस को समेट कर उसने पूछा—

"यह कहाँ हैं"?

'किसे, प्रमोद को पूछती हो? यह तो इघर कल शाम से ही नहीं आया, पर हां, यह माय मिस्टर अग्रवाल के यहाँ बैठा करता है । तुम ठहरो, मैं उसे बुलावाए देता हूँ"।

चन्द्रभूषण ने उत्तर दिया।

उधर प्रमोद की मां दरवाजे की आढ से खड़ी खडी छाया को निहार रही थी और मन ही मन सोच रही थी "कैसी चांद-सी रखी है। चाल ढाल से भी कुलीन धर की यह बेटियों से कुछ अधिक ही जंचेगी, कम नहीं। बात-चीत का दंग कितना अच्छा है। स्वर कितना कोमल और मधुर है। चूल्हे में जाय यह समाज जिसके कारण मैं इस हीरे के टुकड़े को अपने घर में अपनी आौं आँखों के सामने नहीं रख सकती"। इसी समय छाया फिर बोली

"आप उन्हें न बुलवा कर मुझे ही न वहाँ पहुँचवादें?