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प्रमोद के चरणों पर अपना सर्वस्व निछावर करके भी वह प्रमोद को उस अंश तक नहीं पा सकी है जितना एक सहधर्मिणी का अधिकार होता है।

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इसी प्रकार छै महीने और बीत गए। आज वही तिथि थी जिस दिन छाया और प्रमोद विवाह के पवित्र बन्धन में बंधकर एक हुए थे। यह आज बड़ी प्रसन्न हो। सवेरे उठते ही उसने खान किया। एक गुलाबी रंग की रेशमी साड़ी पहनी। जो कुछ आभूषण थे यह सब पहन कर वह प्रमोद के उठने की प्रतीक्षा करने लगी। प्रमोद उठे और उठकर प्रतिदिन के नियम के अनुसार पिता के घर जाने लगे। छाया ने पहले तो उन्हें रोकना चाहा किन्तु फिर कुछ सोच कर बोली–– "आज जरा जल्दी लौटना"।

"क्यों क्या कोई विशेष काम है?" प्रमोद ने पूछा––

"आज अपने विवाह की वर्षगांठ है"।

कुछ प्रसन्नता और कुछ संकोच फे साय छाया ने उत्तर दिया।

"ऊँह, होगी"!––

उपेक्षा से कहते हुए प्रमोद ने साइकिल उठाई और वे चल दिए।

छाया की आँखें डबडबा आई। वह कातरदृष्टि से प्रमोद की ओर जब तक वह आँखों से ओझलन हो गये, देखती रही फिर भीतर जाकर अन्यमनस्क भाव से घर के काम-काज में लग गई। भोजन में आज उसने कई चीजें, जो प्रमोद को बहुत पसन्द थीं, बनाई; किन्तु इधर भोजन का समय निकल जाने पर भी जब प्रमोद घर न लौटे तोवह चिन्तित

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