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वह विमला की प्रत्येक भावभंगी को बड़े ध्यान से देख रहे थे, और जितना ही वह उस पर विचार करते, उनका सन्देह गहरा होता जाता।यह अखिलेश ने भी देखा कि श्राज विमला और विनोद दोनों ही कुछ अस्वस्थ और अनमने हैं। किन्तु उनकी अस्वस्थता के कारण अखिलेश ही हो सकते हैं, यह वह सोच भी न सके क्योंकि विनोद और विमला दोनों के प्रति उनका पवित्र और प्रसाद प्रेम था । उस स्नेह भाव को ध्यान में लाते हुए उदासी का कारण अपने आप को समझ लेना अखिलेश के लिये श्रासान न था। किन्तु फिर भी विनोद और विमला दोनों के ही व्यवहार ने श्राज उन्हें आश्चर्य में डाल दिया। वह न जाने किस विचारधारा में डूबे हुए अपने घर गए । जाते समय कुछ हिचक् और कुछ संकोच के साथ विमला ने उनसे कहा "कभी २ श्राया करना अषित भैया" । विनोद उठकर अखिल के साथ ही हो लिए पातचीत करते करते विनोद अखिल के घर तक पहुंच गये। उन्होंने अखिलेश के साथ ही भोजन भी किया। दोनों काप्रेम सच्चा था। उनका स्नेह इतना निष्फपट था, कि विनोद अपने इस सन्देह को भी अखिल से न दिपा सके, उन्होंने अखिल से यहां तक कह दिया कि-

"भाई अखिल यदि तुम मुझे सुखी देखना चाहते हो तो विमला से जरा कम मिलो।मैं यह जानते हुए कि तुम मेरे हितैषी हो; मेरे यन्धु हो, विमला चाहे एक यार मुझले कोई बात छिपाभीजाय; परतुमन छिपासकोगे,नहीं चाहता कि तुम विमला से अधिक मेल जोल रखो । अखिलेश! मुझे ऐसा जान पड़ने लगता है कि तुम्हारे स्नेह के सामने विमला के हृदय में मेरे स्नेह का दूसरा स्थान हो जाता है ! तुम्हारा मूल्य उसकी आंखों में मुझसे कहीं ज्यादा हो जाता है।" ।