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उपयोगितावाद का अर्थ

बातें बताने की आवश्यकता है। विशेषतया इस बात का स्पष्टीकरण होना चाहिये कि कौन कौन सी चीज़ों को यह सुखद समझता है तथा कौन कौन सी चीज़ों को दुःखद। किन्तु इन बातों की व्याख्याओं का जीवन के उस सिद्धान्त पर-जो आचार के इस सिद्धान्त का आधार है-कुछ प्रभाव नहीं पड़ता। अर्थात् आनन्द तथा दुःख से मुक्ति ही एक मात्र इष्ट लक्ष्य है और सारे इष्ट पदार्थ (जिनकी संख्या उपयोगितावाद की स्कीम में भी उतनी ही अधिक है जितनी और किसी स्कीम में) इसही कारण इष्ट है कि या तो उनमें आनन्द है या उन के द्वारा आनन्द बढ़ता है तथा कष्ट कम होता है।

जीवन का इस प्रकार का सिद्धान्त बहुत से मनुष्यों के मस्तिष्क में चक्कर लगाता है। इन मनुष्यों में कुछ ऐसे भी हैं जो इस सिद्धान्त के घोर विरोधी हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि यह मान लेना, कि जीवन का आनन्द से उच्चतर (उन्हीं लोगों के अनुसार) कोई लक्ष्य नहीं है, जिस की प्राप्ति की हम इच्छा करें तथा जिसके लिये हम काम करें, बिल्कुल ही नीचता है। उन के कथनानुसार यह सिद्धान्त शूकरों का है। प्राचीन समय में भी प्रतिघृणा दिखाने के लिये एपीक्यूरस (Epicurus) के अनुयायियों की भी शूकरों से तुलना की गई थी। इस सिद्धान्त के आधुनिक पोषकों पर भी आजकल जर्मन, फ्रांसीसी तथा अंग्रेज़ विरोधी इस ही प्रकार के नुक्के छोड़ते हैं।

इस प्रकार के आक्षेप किये जाने पर एपीक्योरियन लोगों (Epicureans) ने सदैव यही उत्तर दिया है कि-हम लोग मानुषिक प्रकृति को नीच नहीं प्रदर्शित करते। हमारे विरोधियों ही पर यह दोष घटित होता है जो यह समझते हैं कि मनुष्यों