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नामक ग्रन्थ प्रकाशित कराया। उस समय सर विलियम हैमिलटन एक प्रसिद्ध तत्वज्ञानी समझा जाता था। वह दैववादी था। सन् १८६० तथा १८६१ ई॰ में उसके तत्वशास्त्र विषयक कुछ व्याख्यान छपकर प्रकाशित हुवे थे। इस पुस्तक में मिल ने विशेषतया इन्हीं व्याख्यानों पर समालोचनात्क दृष्टि डाली है।

सन् १८६५ ई॰ में वैस्टमिनिस्टर के आदमियों ने मिल से प्रार्थना की कि आप हमारी ओर से पार्लियामैन्ट की सभासदी के लिये खड़े हों। सन् १८५५ ई॰ में आयर्लैण्ड वालों ने भी उससे सभासदी के लिये उम्मैदवार होने की प्रार्थना की थी किन्तु मिल ने उन की प्रार्थना को कतिपय कारणों से अस्वीकार कर दिया था। एक तो ईस्टइन्डिया में नौकरी करने के कारण उस के पास समय नहीं था और दूसरे वह किसी पक्ष का आज्ञाकारी नहीं होना चाहता था और न सभासद् होने के लिये रुपया खर्च करना उचित समझता था। उस का कहना था कि जो मनुष्य अपने पास से रुपया ख़र्च करके सभासद् होता है वह मानो सभासदी मोल लेता है और प्रगट करता है कि मैं सार्वजनिक सेवा के विचार से नहीं वरन् अपने किसी स्वार्थ के कारण सभासद् होना चाहता हूं।

मिल ने वैस्टमिनिस्टर वालों की प्रार्थना को भी अस्वीकार करना चाहा, किन्तु उन लोगों ने किसी प्रकार पीछा छोड़ा ही नहीं। उनके इस प्रकार के आग्रह को देख कर मिल ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली, किन्तु साफ़ २ शब्दों में कह दिया कि न तो मैं वोट प्राप्त करने तथा रुपया व्यय करने के झंझट में पड़ूंगा और न इस बात का वचन दे सकता हूं कि सभासद् हो जाने पर स्थानीय बातों के विषय में अवश्य प्रयत्न करूंगा। इस प्रकार की स्पष्ट बातें कह कर भी सभासद् निर्वाचित हो जाना मिल ही