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न्याय से सम्बन्ध

उचित शब्द का व्यवहार उन्नत समान में होता है, बहुत कुछ परिवर्तन हुवा है।

मेरे विचार में न्याय या उचित के विचार की उपरोक्त उत्पत्ति तथा वर्धमान विकाश का वृत्तान्त बिल्कुल ठीक है। किन्तु अभी तक यह बात साफ़ नहीं हुई है कि साधारण कर्तव्य तथा नैतिक कर्तव्य में क्या अन्तर है। वास्तविक बात तो यह है कि दण्ड के विधान का विचार, जो क़ानून का सार है, केवल अनुचित ही के लिये नहीं होता वरन सब प्रकार के दोषों के लिये होता है। हम कभी किसी बान को ठीक कहते ही नहीं जब तक कि हमारा यह आशय नहीं होता कि ऐसा काम न करने वाले को किसी न किसी प्रकार दण्ड मिलना चाहिये। यदि क़ानून से ऐसा दण्ड नहीं मिलता तो समाज की सम्मति द्वारा मिलना चाहिये। इस प्रकार भी न हो सके तो ऐसा होना चाहिये कि उस की अन्तरात्मा ( Conscience ) ही ऐसे काम के लिये उस को लानत मलामत करती रहे। ऐसा मालूम पड़ता है कि साधारण मसलहत तथा आचार नीति में वास्तव में यहीं से भेद पड़ना आरम्भ होता है। चाहे हम किसी रूप में कर्तव्य ( Duty ) की कल्पना क्यों न करें, हमारा यह आशय होता है कि कर्तव्य वह है जिसका पालन करने के लिये प्रत्येक मनुष्य को विवश करना ठीक हो। जिस प्रकार किसी मनुष्य से ज़बर्दस्ती क़र्ज़ा वापिस लिया जाता है उसी प्रकार उस से ज़बर्दस्ती कर्तब्य का पालन कराया जा सकता है। जब तक हम यह नहीं समझते कि किसी बात का ज़बर्दस्ती कराना ठीक है तब तक हम उस बात को कर्तब्य ही नहीं कहते। यह बात दूसरी है कि दूरदर्शिता अथवा अन्य मनुष्यों के हित के विचार से हम किसी