पृष्ठ:उपयोगितावाद.djvu/१०१

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१०३
पांचवां अध्याय

क़ानूनी अधिकार तो कह नहीं सकते। इस कारण इस अधिकार को दूसरे नाम से पुकारते हैं। इस अधिकार को नैतिक अधिकार कहते हैं। इस कारण हम कह सकते हैं कि दूसरा अन्याय या नाइन्साफ़ी उस दशा में होती है जब हम किसी व्यक्ति का नैतिक अधिकार छीनते हैं।

३. इस बात को सब लोग ठीक या उचित समझते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को वह चीज़ मिलनी चाहिये जिसका वह अधिकारी है--चाहे वह चीज़ अच्छी हो या बुरी। यह बात अनुचित समझी जाती है कि किसी मनुष्य को ऐसा लाभ कराया जाय या ऐसी हानि पहुंचाई जाय जिसका वह अधिकारी नहीं हैं। साधारणतया मनुष्य उचित या अनुचित अर्थात न्याय-संगत या न्याय-विरुद्ध अथवा इन्साफ़ या ना इन्साफ़ के भाव को इस रूप में समझते हैं। चूंकि अधिकारी होने का सवाल है, इस कारण प्रश्न होता है कि अधिकारी कैसे होता है? साधारणतया यदि कोई मनुष्य ठीक काम करता है तो वह भलाई का अधिकारी समझा जाता है। यदि ग़लत काम करता है तो बुराई का अधिकारी समझा जाता है। विशेषतया यदि कोई मनुष्य किसी के साथ नेकी करता है तो इस बात का अधिकारी है कि वह मनुष्य भी उसके साथ नेकी करे। इसी प्रकार यदि किसी के साथ बुराई करता है तो इस बात का अधिकारी है कि वह मनुष्य भी इसके साथ बुराई करे। बुराई के बदले भलाई का उपदेश कभी इस बात को दृष्टि में रख कर नहीं किया गया है कि ऐसा करना इन्साफ़ है। इस प्रकार के उपदेश में तो अन्य बातों को ख्य़ाल में रखकर इन्साफ़ की बात को छोड़ दिया जाता हैं।