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तेरहवां परिच्छेद।

तब तो मैं पांच सौ रुपये इनाम लूंगी, नहीं तो मेरी झाड़ू की चोट कि कसक न जायगी।”

फिर मैंने सुभाषिणी के पास जाकर यह सारा हाल कह सुनाया। फिर वह अपनी सास से कह आई कि―“आज कुमुदिनी का जी अच्छा नहीं है, सो वह रसोई पानी न कर सकेगा, इसलिये सोना की मा रसोई करे।”

सोना की मा रसोई करने गई―ओर सुभाषिणी ने मुझे अपने कोठे के अंदर ले जाकर भीतर से किवाड़ बंद कर लिया। मैंने पूछा―“यह क्या? वों कैद क्यों करती हो?” सुभाषिणी ने कहा―“तुम्हारा सिंगारपटार करूंगी।”

फिर उसने मेरा मुंह धो धा कर पोछ दिया। बालों में खुशबूदार तेल लगा कर रचपच कर जूड़ा बांध दिया, और कहा,―

इस जूड़े की बंधाई का दाम एक हज़ार रुपया है, सो समय आने पर मेरे ये हज़ार रुपये भेज देना।” इसके अनंतर वह अपनी एक साफ और बढ़ियां साड़ी निकाल कर मुझे पहिराने लगी। उसने उस साड़ी के पहिराने के लिये ऐसी खींचा खींची की कि नंगी होने के डर से मैंने लाचार हो वह साड़ी पहिन ली। इसके बाद वह अपने गहने का डिब्बा ला कर मुझे पहराने बैठी तब मैं बोली―

“मैं कभी न पहिरूंगी।”

इसी बात पर बहुत देर तक मेरे इसके हुज्जत हुई―पर मैंने किसी तरह भी उस के गहने नहीं पहिरे। तब उस ने कहा―“अच्छा, ठहरो, एक सेट दूसरे गहने लिये आती हूं―इन्हीं को