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अठारहवां परिच्छेद।

सूखा लक्कड़!―यह बात पाठकगण भलीभांति समझ गये होंगे―किन्तु भीतर के बड़े ही मोठे, बहुत ही कोमल और अत्यन्त स्नेहवन् थे;―किन्तु रमणबाबू की भांति या आज कल के छोकरीं की भांति “उच्चशिक्षा” में शिक्षित नहीं थे। वे देवरा पितरों को बहुत मानते थे, अनेक देशों में घूमने के कारण उन्हों ने भूत:प्रेत, डाकिनी, प्रोगिनो, योगी, मायाविनी आदिका की बहुतेरी कहानियां सुनी थी, इसलिये इन सभी का वे विश्वास करते थे। वे मुझसे जेसे मोहित हुए थे, यह बात भी उन्हें इसी समय स्मरण हो आई; और जिस को वे मेरी असाधारण बुद्धि कहते थे, यह बात भी उन्हें याद आई और जो कुछ उन की समझ में अब तक न आया था, वह सब भी ध्यान में आ गया। अतएव मैं ने जो वह कहा कि―‘मैं मनुष्य नहीं हूं, वरन मायाविनी हूं’ इस पर उन का कुछ विश्वास हुआ: वे कुछ देर तक सन्न और भयभीत रहे, परन्तु इस के अनन्तर अपनी बुद्धि के बस से उस अंध विश्वास को अपने जी से दूर कर उन्होंने कहा―

“अच्छा, मैं देखता हूँ कि तुम कैसी मायाविनी हो। भला जो जो बातें मैं पूछता हूं, उस का जवाब दो तो सही!”

मैं―पूछिये।

वे―मेरी स्त्री का नाम इन्दिरा है, यह तो तुम जानती हो। परन्तु बल के बाप का नाम क्या है?

मैं―हरमोहनदत्त।

वे―उन का घर कहाँ है?

मैं―महेशपुर।