यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
९७
सोलहवां परिच्छेद।

किसी तरह भी सम्भव नहीं है। जो लोग कहते हैं कि विधवा का विवाह कर दो, और जवान लड़की न होने तक उस का विवाह न करो, स्त्रियों को पुरुष की भांति सकत शास्त्रों में पंडिता करो, वे बेचार अगाध बुद्धिवाले पतिभक्ति के तत्व के भेद को क्या समझेंगे? तौ भी मुस्कुराहट और चितवन के तत्व को दया करके समझाने की जो मैंने प्रतिज्ञा की है उस का यही कारण है कि वह बड़ी मोटी बात है, देखो जैसे महावत अंकुश द्वारा हाथो की वश करता है, कोचवान चाबुक द्वारा घोड़े को धरा करता है, ग्वाला गौआ को लाठी के द्वारा वश करता है, उसी तरह यह लोग भी हंसी और कनखी मटकी से तुम लोगों को अपने वश करती हैं। हम लोगों की पतिभक्ति हो हमलोगों का प्रधान गुण हैं; सो फिर हम लोगों को जो हंसी और कनखी के नीच कलंको से कलंकित होना पड़ता है, यह तुम्हीं लोगों का दोष है।

तुम लोग कहोंगे कि―“यह तो बड़े अहंकार की बात है।” सो ठीक है― हमलोग भी भटोही की ऊलसी हैं―कि फूल की चोट से ही फट जाती हैं। सोई मैं अपने अहंकार का फल हाथों-हाथ पानी थी। जिस देवता के अंग नहीं किन्तु धनुपबान है;―माँ बाप नहीं(१), किन्तु स्त्री मैं―फूल के बाल हैं, किन्तु उन से पहिने के भी टुकड़े टुकड़े हो जाते हैं: वही देवति स्त्री जातियों के गर्व के चूर्ण करनेवाले है। मैंने अपनी हंसी मटकी में फंदे में दूसरे को फांसा जा कर उसे भी फंसवाया और आप भी फंस गई।


(१) भात्मबनि।