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इतिहास तिमिरनाशक


मज़बूती के साथ पड़ी है इस को सिपाह तीन हज़ार में भी कम थी लेकिन शेर क्या गीदड़ों की गिनती से हिचकता हे फ़ौरन हमला कर दिया सख़्त लड़ाई हुई। अमीरों की फ़ौज ने शिकस्त खायी। पांच हजार खेतरहे बाक़ीभागगयीसार्कारी कुल बासठ आदमी काम आये। लड़ाई के बाद छ अमीरों ने अपने तई सर चार्लस नेपिअर के हवाले कर दिया। औरवह फ़तह फ़ीरोज़ी के साथ हैदराबादमें दाख़िलहुआ दूसरेमहीने में सर चार्लस नेपिअर ने इसी तरह डब्बा की लड़ाई में मीरपुर के अमीर को शिकस्त देकर मीरपुर में दख़ल किया। और कुछ सवार सिपाही भेजकर अमरकोट का मज़बूतक़िला ले लिया। जो कोई अमीरों में से इधर उधर बचरहाथा धीरे धीरे हर एक सर्कारकी कैदमें चलाआया। और सिन्धबिल्कुल सर्कारी अमल्दारी में शामिल होगया।

इसी साल के अंदर ग्वालियर में दौलतराव सेंधिया का जानशीन झुनकूजीराव सेंधिया बे औलाद मरगया।उसकीरानी ताराबाई ने जो खुद तेरह बरस की थी एक अपनारिश्तेदार लड़का आठ बरस का जयाजीराव गोद लेकर उसे गद्दी पर बिठा दिया साहिब रज़ीडंट की सलाह से महाराजका मामू यानी मामा साहिब राज का काम अंजाम देने लगा। लेकिन दादा ख़ासगीवाले ने रानी से मिलकर मामा साहिबको निक लवा दिया ओर काम सब अपने हाथमें लिया। साहिबरज़ी- डंट ने यहहाल देखकर धौलपुरकोअमलदारीमैंदेराजा किया। सेंधिया की फ़ौज में फूट पड़ी कुछ लोगतो दादा ख़ासगीवाले की तरफ़ थे। और कुछ बाप सितोलिया को तरफ़ दोदिनतक आपस में गोले चलते रहे आख़िर रानी ने फ़ौज को आपसकी लड़ाई से रोका। दादा ख़ासगीवाला कैद करके आगरेभेजागया और बापू सितौलिया दीवान हुआ। इस अर्सेमें गवर्नरजेनरल का लश्कर ग्वालियर की सर्हद्द पर पहुंच गया था। लार्डएल- नबरा नो ऐसा अच्छा मौक़ा इस ग्वालियर की तरफकाखटका मिटाने का हाथसे जाने देना मुनासिब न समझा क्योकिउधर,