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इतिहास तिमिरनाशक


और बेफ़ाइदा जोड़ तोड़ जमाने में अपना क़ीमती वक्त खोने लगे। अगर बालाहिसार में भी चले जाते जहाँ शाहशुजारहता था और शहर सेलगा हुआ था। मक़दूरनथा कि कभीकोईउन की उस क़िलेसे निकाल सकता। लेकिन जेनरल एलफ़िंस्टनने दिमाग़में ख़लल आगया था। औरब्रिगेडियर शिलटन जोडस कामददगार मुक़र्रर हुआथा हिन्दुस्तान लौटनेको आ़र्जूं में जी देताथा‌। दोनोंने सर विलियम मेकनांटन से यही कहा कि अब काबुल में रहना नामुमकिन जिस तरह बने जलालाबाद पहुंचने का बन्दोबस्त करो। और वहां से हिन्दुस्तान कोचल दो। बलवाइयों का ज़ोर इस अ़र्से में बहुतबढ़ा सारा काबंल पहाड़ी अफ़्ग़ानों से भर गया। शहर के बाहर भी जिधर देखो यही दिखलाई देते थे गोया सारे मुल्कमें बलवा हुआ बाईसवीं नवम्बर को अक्बरख़ां भी काबुल में पाकर उन के शामिल हो गया। निदान जब सर विलियम मेकनाटन ने देखा कि सारी फोन का हर तरफ़ नुकसान होता जाता है और उसके अफ़सर सिवाय हिन्दुस्तान लौट चलने के और किसी बात पर मुस्तइद नहींहोते अकबरखां से काबुल छोड़ने को बातचीत शुरू की और यह ठहरी कि दोनोंकी मुलाकात हो उस में सारी शत ते पाजायें लोगोंने मेक नाटन साहिब से कहाकि अकबरखां का इतबार करना अक्लमन्दी नहीं है। उन्हों ने इतनाही जबाब दिया कि हम खूब जानते हैं लेकिन ऐसी जिंदगीसे सो दफा मरना बिहतरहे। निदान तेईसवींदिसम्बर को करीब दोपहर के सर बिलियम मेकनाटन साहिब कमान लारंस ट्रेवर और मिकंज़ी को साथ लेकर छावनीसे अकवरखां की मुलाक़ातको बाहर निकले अकबरखां इस्तिकबालकरके उन्हें अपने देरेपर लेगया। लेकिन वहां इन चारोंसे पिस्तौल और तलवारें छिनवाकर तीनको तो अपने सवारोंके पीछे बिठला किसी क़िले में भिजवा दिया ( कप्तान ट्रेवर घोड़ेसे गिर जाने


यही सर हेनरी लारंभ सन् १८५० के बलवे में अवध के चीफ़ कमिश्नर थे।