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उन्नीसववां परिच्छेद
सिंचाई(Irrigation )

उन्नीसवाँ परिच्छेद सिंचाई ( Irrigation) जलवायु के परिच्छेद में हम यह कह आये हैं कि मदरास समुद्र तट को छोड़ कर सारे देश में वर्षा गरमियों के दिनों में होती भारतवर्ष में है। जून के अन्तिम सप्ताह से लेकर सितम्बर तक यहाँ जल-वृष्टि . वर्षा होती है । वर्ष का शेष भाग अधिकतर सूखा रहता है। अतएव आसाम, बंगाल के कुछ भाग, तराई तथा पश्चिमी समुद्र तट के मैदानों को छोड़ कर जहाँ वर्षा बहुत होती है सारे देश में रबी की फसल उत्पन्न करने के लिए सिंचाई की आवश्यकता होती है। वर्षा केवल मौसमी ही नहीं है वरन अनिश्चित भी है। किसी वर्ष किसी भाग में वर्षा बहुत देर से प्रारम्भ होती है और शीघ्र ही समाप्त हो जाती है। कभी वर्षा बहुत जल्दी प्रारम्भ हो जाती है। वर्षा का केवल समय ही अनिश्चित नहीं है, कितनी जल वृष्टि होगी यह भो अनिश्चित है। यदि किसी स्थान की औसत जल वृष्टि ५० इंच है तो वहाँ किसी वर्ष २५ इंच भी वर्षा हो सकती है और किसी वर्ष ६. या ७० इंच भी पानी बरस सकता है। भारतवर्ष कृषि प्रधान देश है, खेती के लिए निश्चित और समय पर जल- वृष्टि होना आवश्यक है। अस्तु भारतवर्ष में जहां वर्षा ५० इंच से अधिक होती है उन भागों को छोड़ कर शेष भागों में सिंचाई की आवश्यकता है। यही कारण है कि भारतवर्ष में अत्यन्त प्राचीन काल से नहरें, तालाब, बावड़ा तथा कुयें बनाने को परिपाटी चली आ रही है । सिन्ध, सीमा प्रान्त, पंजाब, राजपूताना, मध्य भारत, युक्त प्रान्त, दक्षिण प्रायद्वीप तथा बिहार खेती के लिए सिंचाई पर निर्भर हैं। यदि किसी वर्ष यहाँ वर्षा नहीं होता या कम होती है तो अकाल पड़ जाता है। देश को दुर्भिक्ष से बचाने के लिए सिंचाई के साधनों की बहुत आवश्यकता है। उत्तर-पश्चिम के प्रान्त तो साधारणतः सिंचाई पर ही निर्भर हैं वहीं तो बिना सिंचाई के खेती सम्भव ही नहीं है। सिंचाई के साधनों की दृष्टि से भारतवर्ष संसार में प्रथम स्थान रखता है । संसार में जितनी खेती की भूमि मींची जाती है उसकी आधी के लगभग भारतवर्ष में है। भारतवर्ष की स्थायी नहरों (-Perennial ।