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भारतवर्ष की प्रकृति

भारतवर्ष की प्रकृति . पूर्वक कुछ भी ज्ञात नहीं हो सका है वहीं तो जनसंख्या को केवल कूता गया है कोई मनुष्य गणना नहीं हुई है। भिन्न देशों की जनसंख्या १६३६ में इस प्रकार थी:-भारत ३८२० लाख, सायबेरिया ६०, लाख चीन ४५०० लाख ( १ ) मंगोलिया ६० लाख, सोवियत रुस १६४० लाख, कनाडा ११० लाख, ब्राजील ४१० लाख, संयुक्तराज्य अमेरिका १३१० लाख आस्ट्रेलिया ७० लाख । भारतवर्ष के इस विस्तृत क्षेत्रफल और बड़ी जनसंख्या के कारण कुछ विद्वान भारत को एक महाद्वीप कहते हैं। किन्तु वास्तविक बात तो यह है कि भारत एक बड़ा देश है । प्रकृति ने उसे एक भौगोलिक इकाई बनाया है, उसे भौगोलिक एकता प्रदान की है। यद्यपि आज एक राजनैतिक कुचक्र के कारण भारत का विभाजन हो गया है किन्तु यह दोनों राज्यों के लिए अहितकर है और भारत तभी समृद्धिशाली और उन्नत हो सकता है जबकि भारत के दो टुकड़े मिलकर एक हो जावें । वास्तव में प्रकृति ने भारत को एक देश बनाया है । मनुष्य का राजनैतिक पागलपन चाहे उसे कुछ समय के लिए विभाजित कर सके किन्तु बाद को उसे एक होना ही पड़ेगा। यद्यपि पराधीन रहने के कारण भारत अर्थिक दृष्टि से पिछड़ा राष्ट्र बना रहा किन्तु भारत में प्राकृतिक देन बहुत है। भारतवर्ष प्राकृतिक देन का धनी देश है। तभी कुछ लोगों ने कहा है भारत एक धनी देश है जिसमें निर्धन मनुष्य रहते हैं। कारण यह है कि हम पराधीनता तथा अन्य कारणों से उस प्राकृतिक देन का पूरा उपयोग नहीं कर सके, उद्योग-धषों को उन्नति नहीं कर सके। किन्तु अब जब भारत स्वतंत्र हुआ है तो भविष्य में उसके आर्थिक विकास की बहुत आशा है । भविष्य में वह संसार में प्रमुख औद्योगिक राष्ट्र बनेगा इस में तनिक भी संदेह नहीं है। भारत का आर्थिक भूगोल हमें बतलाता है कि भारत के भावी आर्थिक विकास के लिए उसके पास कौन से साधन हैं और उनका किस प्रकार पूरा पूरा उपयोग किया जा सकता है। भारतवर्ष एक विशाल देश है । यहाँ समतल मैदान, गगनचुम्बी ऊँचे पर्वत, नदियों की घाटियो, विस्तृत मरुभूमि, सघन वन सभी प्रकार के प्रदेश देखने को मिलते हैं, किन्तु पृथ्वी की बनावट के अनुसार हम देश को चार भागों में बाँट सकते हैं। (१) हिमालय का पहाड़ी प्रदेश जो उत्तर में स्थित है। (२) गंगा और सिंघ के मैदान जो गंगा के डेल्टा से सिंध के डेल्टा तक फैले हुए हैं।