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आर्थिक भूगोल के सिद्धान्त

आर्थिक भूगोल के सिद्धान्त के लिए उपयोग किया जाता है । आधुनिक प्रौद्योगिक केन्द्रों में जो अत्यधिक घनी आबादी हो गई है उससे बचने का एक ही उपाय है कि धन्धों का एक ही स्थान पर जमघट न होने देना. और यह तभी हो सकता है जब बिजली का अधिकाधिक उपयोग हो। व्यवसायियों को कारखाने स्थापित करते समय मजदूरों की समस्या पर . भी विचार करना पड़ता है। जहां तक साधारण मजदूरों श्रम का प्रश्न है उनके मिलने में अधिक कठिनाई नहीं ( Labour ) होती । यद्यपि कहीं कहीं साधारण मजदूरों की भी कमी होती है । परन्तु जिन धन्धों में कुशल मजदूरों (Skilled Inbourers ) को विशेष आवश्यकता होती है उसको स्थापित करते समय इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि जहाँ कारखाना स्थापित करना है वहाँ कुशल मजदूर मिल सकते हैं अथवा नहीं। किसी-किसी स्थान पर कोई धन्धा केवल इसलिए केन्द्रित हो जाता है कि उस स्थान पर धन्धे के लिए कुशल मजदूर मिलते हैं। जब कोई धन्धा कुछ समय तक एक स्थान पर ही चलता रहता है तो वहाँ के मजदूरों को उस धन्धे का अनुभव हो जाता है और वे अधिक कुशल हो जाते हैं । अतएव यदि उस चीज़ को तैयार करने के लिए कोई नया कारखाना स्थापित होता है तो कुशल मजदूरों की सुविधा के कारण उसी स्थान पर खोला जाता है। उदाहरण के लिए लंकाशायर .. में कपड़े का धन्धा केवल इसलिए पनपा क्योंकि ऊनी कपड़ा तैयार करने वाले बुनकर (जुलाहे ) वहां मौजूद थे। इसी प्रकार स्काटलैंड के पूर्वीय जिलों में जूट का धंधा इस कारण पनपा क्योंकि वहाँ सन का कपड़ा पहले से बनता था और वहाँ कुशल मजदूर मौजूद थे। किसी किसी धन्धे में कुशल श्रमजीवियों की इतनी अधिक आवश्यकता होती है कि यदि स्थानीय मजदूर नहीं मिलते तो बाहर से बुलाने पड़ते हैं। ताता के लोहे के कारखाने में काम करने के लिए प्रारम्भ में विदेशों से कुशल कारीगरों को बुलाना पड़ा । धीरे-धीरे जब स्थानीय कारीगर तैयार हो गए तब विदेशी कारीगरों की आवश्यकता नहीं रही। कभी कभी धन्धे ऐसी जगह स्थापित कर दिये जाते हैं जहाँ कि भूमि सस्ती होती है और श्राबादी घनी नहीं होती। ऐसी सस्ती भूमि जगह विशेष कर वे धन्धे स्थापित किये जाते हैं जिनमें कोयले की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती अथवा जो चीज़ तैयार की जाती है वह अधिक मूल्यवान होती है। अधिकतर रेलवे कम्पनियां अपना वर्कशाप ऐसी जगहों पर बनाती हैं जहाँ