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आनन्द मठ


निमीने कहा-इसे पहन लो।"

उसने कहा-"मैं पहनकर क्या करूंगी?"

इसपर उसके कमनीय गलेमें बाहुलता डालकर निमाईने कहा-“भैया आये हैं। तुम्हें बुला रहे हैं।"

युवतीने कहा-"हमें बुलाया है तो ढाकेकी साड़ोकी क्या जरूरत है? चल, इसी तरह चलूं।"

निमाईने उसके गालमें एक चपत जमा दी। उसने निमाईके गले में हाथ डाल उसे झोंपड़ीके बाहर कर कहा-"चलो उन्हें यही फटी साड़ी पहने अपनी सूरत दिखा आऊं।”

लाख कहनेपर भी उस युवतीने साड़ी नहीं पहनी। लाचार निमाई राजी हो गयी और अपनो भाभीको साथ लिये अपने घरके दरवाजेतक आयी, और उसे भीतर भेज बाहरसे किवाड़ बन्द कर आप दरवाजेपर खड़ी हो रही।




सोलहवां परिच्छेद

उस स्त्रीकी अवस्था पचीस वर्षके लगभग थी; पर देखने में वह निमीसे अधिक वयसवाली नहीं मालूम पड़ती थी। जिस समय वह मैले कुचैले वस्त्र पहने, उस घरके अन्दर आयी, उस समय ऐसा मालूम पड़ा, मानों उजाला हो गया। ऐसा मालूम ‘पड़ामानों किसी वृक्षके पत्तोंसे ढकी हुई सभी कलियां एक साथ खिल गयीं। मानों बन्द गुलाबजलके करावेका मुंह किसीने खोल दिया। मानों किसीने बुझती हुई आगमें धूप और गुग्गुल डाल दिया! वह रमणी घरमें प्रवेश कर चारों ओर अपने स्वामी को ढूंढने लगी। पहले तो उसने उन्हें नहीं देखा, पर थोड़ी देर बाददेखा कि आंगनमें आमके छोटे पेड़के सोरपर सिर रखे जीवा नन्द रो रहे हैं। सुन्दरी ने उनके पास पहुंचकर धीरे-धीरे उनका