यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१८२
आनन्द मठ

शान्तिने झटपट जीवानन्दको गोदमें उठा लिया और तालाब की ओर ले चलो। महापुरुषने कहा-"तुम उसे तालाबके पास ले जाकर जहां जहां खून लगा है सब अच्छी तरहसे धो डालो।"

शान्तिने जीवानन्दको तालाबके पास ले जाकर खनके सब दाग धोये। तबतक वे महापुरुष जङ्गली लता-पत्रों का प्रलेप बनाये हुए आ पहुंच। उन्होंने तमाम जनोंके ऊपर वही लेप लगा दिया और बारबार जीवानन्दके शरीरपर हाथ फैरना शुरू किया। थोड़ी ही देरमें जीवानन्द चटपट उठ बैठे। उठते ही उन्होंने शान्ति की ओर देखते हुए कहा-“युद्ध में किसकी जय हुई!”

शान्तिने कहा-“तुम्हारी। इन महात्माको प्रणाम करो।"

उसी क्षण सबने देखा, वहां तो किसीका पता भी नहीं है। अब वे प्रणाम किसको करें?

इधर पास ही जीतकी खुशीमें फूली हुई सन्तान-सेना बड़ा ऊधम उत्पात मचाये हुए थी। पर शान्ति और जीवानन्द वहांसे हिलेतक नहीं, चुपचाप उस पूर्णिमाकी चांदनीमें चमकती हुई पुष्करिणीके घाटपर बैठे रहे। औषधके प्रभावसे जीवानन्दका शरीर तुरत भला-चङ्गा हो गया। उन्होंने कहा-“शान्ति! उस वैद्यकी औषधिका कैसा विचित्र चमत्कार है। मेरे शरीर में इस समय न तो कहीं कुछ पीड़ा है, न किसी तरहकी थकावट मालूम होती है। अब चलो, कहां चलोगी? वह देखो सन्तान-सेनाके जय जयकारका शब्द सुनाई दे रहा है।"

शान्ति ने कहा-- "अब वहां नहीं माताका कर्योधार हो चुका। देश सन्तानोंका हो गया। हम लोग कुछ राज्य हिस्सा बंटाना नहीं चाहते अब वहां किस लिये चले?"

जीवा-"जो राज्य औरोंसे छीना है, उसकी अपने बाहुबलसे रक्षा करेंगे।"