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आनन्द मठ


ऐसा अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव है, जो इस समय मेरो रक्षा कर सके? यह देखो, चुटीले शेरकी तरह सब गोरे मेरे ऊपर टूट रहे हैं। मैं तो मरनेके लिये आया ही हूं। अब बतलाओ कौन कौन सन्तान मेरे साथ मरना चाहते हैं।"

सबसे पहले धीरानन्द आगे आये। इसके बाद जीवानन्द। साथ ही दस, फिर पन्द्रह, फिर बीस और अन्तमें ५० सन्तान आकर वहीं इकट्ठे हो गये। भवानन्दने धीरानन्दको देखकर कहा-"तुम भी क्या हमारे ही साथ मरने आये हो?"

धीरा-"क्यों? मरनेमें भी किसीका इजारा है?” यह कहते हुए धीरानन्दने एक अंगरेजको घायल किया।"

भवा०-"नहीं, नहीं, मेरे कहनेका मतलब यह है कि तुम तो स्त्री पुत्रका मुंह देखते हुए सुखसे दिन बिताना चाहते थे।"

धीरा०-"कलवाली बातका इशारा कर रहे हो? क्या अब भी तुम्हारी समझमें कुछ न आया?" यह कहते कहते-धीरानन्द ने उस घायल गोरेको मार गिराया।"

भवा०-"नहीं"

बात पूरी भी न होने पायी थी, कि एक गोरेने भवानन्दका दाहिना हाथ काट डाला।

धीरा०-"मेरी क्या मजाल, जो मैं तुम्हारे जैसे पवित्रात्मासे वैसी बातें कहता? मैं तो उस समय सत्यानन्दका जासूस बनकर गया हुआ था।"

भवा०-“यह क्या? क्या महाराज मेरे ऊपर सन्देह करते हैं?"

उस समय भवानन्द एक ही हाथसे लड़ रहे थे। धीरानन्दने उसकी रक्षा करते हुए कहा-"कल्याणीके साथ तुम्हारी जो जो बाते हुई थीं, वे सब महाराजने अपने कानों सुन ली थीं।"

भवा०-“सो कैसे?

धीरा०-वे स्वयं वहां गये थे। देखो, सावधान हो जाओ।"