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आठवां परिच्छेद


कोई कहता-"क्या वह दिन देखना भी नसीब होगा, कि हम मसजिदें गिराकर उनपर राधामाधवके मन्दिर उठायेंगे?" कोई कहता-"भाई! कब वह दिन आयेगा, जब हम अपना धन आप ही भोगेंगे?"

दस हजार मनुष्यों के कण्ठ से निकला हुआ कलरव, मन्दमन्द हवाके वेगसे चलायमान वृक्षके पत्तोंके मरमर शब्द, बालुकामयी तरंगिणीका मृदु कल-कल शब्द, नीले आसमानके चन्द्र-तारे, स्वच्छ मेघोंके समूह, हरी-भरी भूमिपर हरा-भरा कानन, नदीका स्वच्छ जल, उजले रंगकी रेत, विकसित कुसुम-राशि और सबके वित्तको प्रसन्न करनेवाला बीच-बीचमें होनेवाला "वन्देमातरम्' गान क्या ही मनोहर दृश्य था! ऐसे ही समय सत्यानन्द उल सन्तान-मण्डलीके बीच में आ खड़े हुए।

उस समय उन दस हजार सन्तानों के मस्तक वृक्षोंके बीचसे छन-छनकर आनेवाली चन्द्र-किरणोंके पड़नेसे हरी-हरी घासोंवाली जमीन की तरह मालूम पड़ने लगे। आंखों-में आंसूभरे, दोनों हाथ ऊपर उठाये सत्यानन्दने बड़े ऊचे स्वर-से कहा-"शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी, वनमाली, वैकुण्ठनाथ, केशीसहारक, मधुमुरनरकमदेन, लोकपालक तुम्हारा मंगल करें। वे ही तुम्हारी भुजाओं में बल दें, मनमें भक्ति, धर्ममें मति दें। एक बार सब लोग प्रेमसे उनकी महिमाका गीत गाओ। यह सुनते ही हजारों कण्ठोंसे उच्चस्वरमें यह संगीत निकल पड़ा।

“जय जगदीश हरे!
प्रलय पयोधि जले धृतवानसि वेदं,
विहितवहिनचरित्रमखेदम्,
केशव धृत मीन शरीर,
जय जगदीश हरे!"

फिर सबको आशीर्वाद देते हुए सत्यानन्दने कहा-"सन्तान गण! आज मैं तुम लोगोंसे एक जरूरी बात कहना चाहता हूं।