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दूसरा परिच्छेद


वह घना जंगल बाघों, भैसों और भालुओंसे भरा हुआ होनेके कारण बड़ा भयावह था। इसलिये कुछ दूर आनेपर शिकारियोंने आगे बढ़नेसे इनकार कर दिया। वे बोले,—"बस, अब आगे भीतर जानेका रास्ता नहीं है। हमलोग तो अब आगे नहीं जा सकते।" एक बार डनवर्थ साहब इसी जंगलमें एक भयानक शेरके पंजे में पड़ते पड़ते बच गये थे, इसलिये उन्होंने भी आगे जाना स्वीकार नहीं किया-सबको इच्छा लौटनेकी ही थी। कप्तान टामसने कहा,-"तुम लोग न जाओगे, तो लौट जाओ, पर मैं तो अब नहीं लौटता।" यह कह, कप्तान साहब उस घोर जंगलमें घुस पड़े।

सचमुच उस जंगलमें रास्ता नहीं था। घोड़ा आगे न बढ़ सका; पर साइब घोडेको छोड़, कन्धेपर बन्दूक लिये अकेले ही आगे बढ़े। वे घुसे तो बाघकी खोजमें थे; पर खोजते-खोजते हैरान हो गये, तो भी कहीं बाघ न दिखाई दिया। उसके बदले उन्होंने देखा कि एक बड़े भारी पेड़के नीचे खिले हुए फूलोंवालो लताओं और छोटे छोटे पौधोंके बीच में न जाने कौन बैठा है? वह एक नवीन संन्यासी था, जिसके रूपसे वह सारा जंगल उज्ज्वल हो रहा था। खिले हुए फूल मानों उसके स्वर्गीय शरीरके सम्पर्कलसे और भी अधिक सुगन्धमय हो गये थे। कप्तान साहब भौंचक से हो रहे पर तुरन्तही क्रोध आ गया। वे हिन्दुस्तानी बोली विचित्र तरहसे बोलते थे। उन्होंने पूछा,-"टुम कौन हाय?"

संन्यासीने कहा, "मैं संन्यासी हू।"

कप्तानने पूछा,-"टुम बागी है?"

संन्यासी-“यह किस जानवरका नाम है?"

कप्तान-“हम टुमको गुली मार देगा।"

संन्यासी-"मार दो।”

कप्तान मन हो मन विचार कर रहे थे, कि गोली मारुं