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[ पहला
आदर्श महिला

ढूँढ़ता हुआ समुद्र पार होकर यहाँ आया हूँ। माताजी! मैं आप का पुत्र हूँ। कृपा करके पुत्र की प्रार्थना पूरी कीजिए।

यह सुनकर सीता पहले कुछ कह नहीं सकीं। वे सोचने लगीं—यह क्या सपना है? यह छोटासा बन्दर उस डरावने लमुद्र को पार कर यहाँ आ सकता है? क्या यह भी सम्भव है? यह किसी मायावी का कपट तो नहीं है? फिर माता के सम्बोधन की याद आने से उनके मन में ख़याल आया कि अगर यह मायावी का कपट है तो इसके मुँह से "माता" शब्द क्यों निकला! यह सोच- कर, सीताजी ने सन्देह को दूर करके कहा—बेटा! तुम कौन हो? तुम इस दुस्तर समुद्र को पार कर यहाँ कैसे आये?

हनुमान् ने संक्षेप में सब हाल बताकर सन्देह मिटाने के लिए सीताजी को रामचन्द्रजी की दी हुई अँगूठी दी।

विरह से मरती हुई सीता आर्य रामचन्द्र की अँगूठी पाकर पुल- कित हुई। वह अँगूठी उनकी दुर्भाग्यरात्रि में चन्द्र की क्षीण ज्योति- सी मालूम होने लगी और उसने उनके पूर्व जीवन की सारी सुख- स्मृति की याद दिला दी। सीताजी की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा—"वत्स! आर्य-पुत्र कैसे हैं?" हनुमान ने कहा-माता! पर्वत को तरह विराट् गम्भीर रामचन्द्र आपके विरह से पागल-से हो रहे हैं। आपके विरह में फूलों की सुगन्ध, शीतल मन्द बयारि का स्पर्श और प्राकृतिक शोभा उनके लिए दुःखदायी हो रही है। और तो क्या, उनको भोजन तक नहीं रुचता।

सीताजी हनुमान के मुँह से यह सब सुनकर रोने लगीं। उन्हें अपने जीवन की, एक-एक करके, सब बातें याद आ गई। हनुमान् ने ककहा-"माँ! आप कहें तो मैं आपको पीठ पर चढ़ाकर श्रीरामचन्द्र के