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एक पुत्र तो बचपन में ही मर गया, दूसरे को उसने इंगलैंड अपनी बहन के पास पालन-पोषण के लिए भेज दिया। उसका व्यय वह वहां भेजता रहता था।

सन् १७६१ तक हेस्टिंग्स मुर्शिदाबाद की ऐजेण्टी करते रहे, बाद में उन्हें कौंसिल का मेम्बर बनाकर कलकत्ते भेज दिया गया। उस समय कलकत्ते के गवर्नर वेनसीटार्ट थे, जो हेस्टिग्स के बहुत प्रशंसक थे।

कौंसिल के मेम्बर की हैसियत से हेस्टिग्स १७६२ में पटना की दशा देखने गए। उन दिनों पटना बाहर जन-शून्य था। व्यापार बन्द था, दुकानें बंद थीं। अंग्रेजों की लूट-खसोट से डरकर लोग भाग गए थे। इस दयनीय दशा को देखकर उनका युवक हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने कलकत्ता गवर्नर को लिखा-पटना में भारी अन्याय हुआ है, नवाब और हमारे अधिकारियों में समझौता हुए बिना इस प्रकार के अत्याचार नहीं रोके जा सकते।

हेस्टिग्स ने इन झगड़ों का अध्ययन करके ठोस प्रस्ताव बनाये, जिन्हें लेकर वह मीरकासिम से मिला। हेस्टिग्स और मीरकासिम के बीच उन प्रस्तावों पर उचित विचार हुआ, जिसे दोनों ही पक्षों ने स्वीकार किया। परन्तु जब कलकत्ता काउन्सिल में हेस्टिंग्स के समझौते की रिपोर्ट पहुँची, तब अधिकांश स्वार्थी अंग्रेजों ने उसका विरोध किया और उसे रद्द कर दिया। इस कारण मीरकासिम से फिर विग्रह छिड़ा, जिसमें उसे पराजित होकर बंगाल से भागना पड़ा। अंग्रेजों ने बंगाल में विजय प्राप्त की।

हेस्टिग्स को इंगलैंड से भारत आए चौदह वर्ष बीत चुके थे। उन्होंने कौंसिल की सदस्यता से त्यागपत्र देकर अपने देश जाने की तैयारी की। उनके मित्र गवर्नरवेनसीटार्ट भी उनके साथ स्वदेश लौटने को तैयार हुए। हेस्टिग्स चौदह वर्ष बाद अपने घर लौट रहे थे। उन्हें अपनी बहन मिसेज बुडमैन और अपने प्रिय पुत्र की स्मृति बेचैन कर रही थी। अपने पुत्र को अपने हृदय से लगाने की आशा में ज्योंही वे जहाज से उतरकर इंगलैंड भूमि पर उतरे। उनकी बहन उदास मुख उनके स्वागत के लिए तैयारखड़ी थी। पुत्र को उसके साथ न देखकर उन्होंने पूछा-"वह कहाँ है?"

बहन ने भाई को अपने गले से लगाते हुए रुंधे कण्ठ से कहा-"अभी दो दिन पहले ही संक्षिप्त बीमारी में उसका निधन हो गया है।"

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