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व्रत भंग

से नंदन और राधा के लिए एक क्रीड़ा और कुतूहल का सृजन करती रहती। न दन कभी राधा के खिसकते हुए उत्तरीय को सँभाल देता।

राधा हँस कर कहती-

बड़ा कष्ट हुआ।

नन्दन करता-देखो तुम अपने प्रसाधन ही म पसीने-पसीने हो जाती हो तुम्हें विश्राम की आवश्कता है।

राधा गर्व से मुस्करा देती । कितना सुहाग था उसका अपने सरल पति पर और कितना अभिमान था अपने विश्वास पर ! एक सुखमय स्वप्न चल रहा था।

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कलश धन का उपासक सेठ अपनी विभूति के लिए सदैव सशक रहता । उसे राजकीय सरक्षण तो था ही देवी रक्षा से भी अपने को सम्पन्न रखना चाहता था। इस कारण उसे एक नंगे साधु पर अत्यत भक्ति थी जो कुछ ही दिनों से उस नगर के उपकण्ठ में आकर रहने लगा था।

उसने एक दिन कहा-सब लोग दशन करने चलेंगे। उपहार के थाल प्रस्तुत होने लगे। दिव्य रथों पर बैठ कर सक साधु दर्शन के लिए चले । वह भागीरथी तट का एक कानन था जहाँ कलश का बनवाया हुआ कुटीर था ।

सब लोग अनुचरों के साथ रथ छोड़ कर भक्तिपूर्ण हृदय से साधु के समीप पहुँचे । परंतु राधा ने जब दूर ही से देखा कि वह साधु नग्न है तो वह रथ की ओर लौट पड़ी । कूलश ने उसे बुलाया पर राधा न आई । नन्दन कमी राधा को देखता और कभी अपने पिता को । साधु खीलों के समान फूट पड़ा । दाँत किट किटाकर उसने कहा-यह तुम्हारी पुत्र बधू कुलक्षया है कलश ! तुम इसे हटा दो नहीं तो तुम्हारा नाश