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आँँधी


घीसू रुक गया ।

बिन्दो ने फिर कहा तो अब जाती हूँ अब इसी के संग । हा हा वह भी क्या अब पूछने की बात है !

बिदो चली घीसू भी पीछे-पीछे बगीचे के बाहर निकल आया । सड़क सुनसान थी। दोनों चुपचाप चले । गोदौलिया की चौमुहानी पर आकर घीसू ने पूछा--अब तो तुम अपने घर चली जानोगी। कहा जाऊँगी | अब तुम्हारे घर पर चलँगी।

घीसू बड़े असमजस में पड़ा। उसने कहा—मेरे घर कहाँ १ नन्दू बाबू की एक कोठरी है वहीं पड़ा रहता हूँ, तुम्हारे बहा रहने की जगह कहा।

बिन्दो ने रोदिया । चादर के छोर से भासू पोछती हुई उसने कहा-तो फिर तुमको इस समय पहुंचने की क्या पड़ी थी। मैं जैसा होता भुगत लेती ! तुमने वहा पहुँच कर मेरा सा चौपट कर दिया मैं कहीं की न रही।

सड़क पर बिजली के उजाले में रोती हुई विदो से बात करने में धीसू का दम घुटने लगा। उसने कहा--तो चलो। दूसरे दिन दोपहर को थैली गोविदराम के घाट पर रख कर घीसू चुपचाप बैठा रहा । गोवि दराम की बूटी बन रही थी। उन्होंने कहा- घीसू आज बूटी लोगे?

घीसू कुछ न बोला।

गोविदराम ने उसका उतरा हुआ मुँह देखकर कहा -क्या कहें घीसू ! आज तुम उदास क्यों हो।