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आँँधी
 

आँँधी

मैं लड़कों को पढाने लगा। कितना आश्चर्यजनक भयानक परिवर्तन मुझ म हो गया। उसे देखकर मैं ही विस्मित होता था | कलुआ इन्हीं कई महीनों म मेरा एकात साथी बन गया | मैंने उसे बार बार समझाया कि तु वह बीच बीच में मुझसे घर चलने के लिए कह बैठता ही था। मै हताश हो गया। अब वह जब पर चलने की बात कहता तो मैं सिर हिला कर कह देता-अच्छा अभी चलगा।

दिन इसी तरह बीतने लगा | वसत के प्रागमन से प्रकृति सिहर उठी । वनस्पतियां की रोमावली पुलकित थी ! मैं पीपल के नीचे उदास बैठा हुआ ईषत् शीतल पवन से अपने शरीर म फुरहरी का अनुभव कर रहा था। श्राकाश की आलोक माला च दा की वीचियों में डुबकियाँ लगा रही थीं। निस्त ध रात्रि का श्रागमन बड़ा गम्भीर था।

दूर से एक संगीत की-नन्हीं नहीं करण वदना की तान सुनाई पड़ रही थी । उस भापा को मैं नहीं समझता था। मैंने समझा यह भी कोई छलना होगी। फिर सहसा मैं विचारने लगा कि नियति भया नक वेग से चल रही है | आँधी की तरह उसम असंख्य प्राणी तुणं तालिका के समान इधर उधर बिखर रहे हैं। कहीं से लाकर किसी को वह मिला ही देता है और ऊपर से कोई बोझे की वस्तु भी लाद देती है कि वे चिरकाल तक एक दूसरे से सम्बद्ध रहें । सचमुच ! कल्पना प्रत्यक्ष हो चली । दक्षिण का श्राकाश धूसर हो चला-एक दानव तारात्रों को निगलने लगा। पक्षियों का कोलाहल पढा। अतरिक्ष व्याकुल हो उठा ! कड़कड़ाहट में सभी श्राश्रय खोजने लगे कि तु मैं कैसे उठता ! वह सगीत की ध्वनि समीप पा रही थी। वप्रनिघोष को भेद कर कोई कलेजे से गा रहा था। अधकार के साम्राज्य मे तृण लता वृक्ष सचराचर कम्पित हो रहे थे।

कलुआ की चीत्कार सुन कर भीतर चला गया । उस भीषण कोलाहल मे भी वही संगीत ध्वनि पवन के हिंडोले पर झूल रही थी