पृष्ठ:अहिल्याबाई होलकर.djvu/१६९

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अपने जीवन को संकट में चलाने का प्रयन्न किया था उस समय क्या मैंने ब्रह्म की इच्छा को धार्मिक पन से पूर्ण नहीं किया था और क्या उसका हार्दिक आशीर्वाद मेरे समान उस स्त्री को जो अपने स्वामी के साथ सती होने से वंचित रही न मिला होगा ? जिस समय मेरे राज्य में मेरी संपूर्ण दुखी प्रजा मेरे संतान के समान थी उस समय सब बातें स्पष्ट रीति से और सुंदरता से मेरे जीवित रहने के लिये उसकी आज्ञा प्रगट करती थी । हां ! यद्यपि मैं एक विधवा अभागिनी थी तथापि मेरा कोमल हृदय अपने अन्य कर्तव्यों से पराडमुख नहीं होने पाया था । तू उस समय मेरी नितांत एक छोटी लता के समान बालिका थी और तेरा प्रेम मुझ पर उस समय कुछ न था किंतु तिस पर भी मम्र मग्न हृदय में तेरा जो कि मेरी प्यारी और अत्यंत सुंदरपुत्री थी, विचार था, सो आज क्या तु मुझे उदास और अकेली छोड़ जावेगी; जब तू सती होकर चली जावेगी तो मैं किस प्रकार जीवित रह सकूंगी, मैं किसको इतने लाड़ चाव से प्रेम करूंगी और किसपर अपना विश्वास रखूंगी । ओ मेरी प्यारी पुत्री तू मुझे इस वृद्धावस्था में दुःखी करके धूल में न मिला जा ।

तब पुत्री मुक्ता ने कहा-अरे माँ यही तेरी रक्षा से रक्षित तेरी संतान तो प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है, उन पर प्रतिदिन जो परोपकार तुम करती हो उसके प्रति सर्व शक्तिमान परमेश्वर तुम पर नित्यप्रति अखण्ड शांति प्रदान करता ही है, तुम्हारी वृद्धावस्था होने के कारण तुम्हारे जीवन का आधार मुझे बहुत काल तक नहीं हो सकता, इस कारण मेरी भविष्य