पृष्ठ:अहिल्याबाई होलकर.djvu/१५२

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मनुष्य निश्चय करके कार्य आरंभ करता है, और दुःख तथा विघ्न होने पर भी जो बीच में कार्य को नहीं छोड़ता, जिसका समय व्यर्थ नहीं जाता और जिसका मन वश में रहता है वही बुद्धिमान् है। जो सदा उत्तम कामों में मन लगाता है, जो सदा मंगलदायक कार्य करता है और जो किसी की बुराई नहीं करता वही मनुष्य पंडित है।

क्षमा संसार भर को वश में कर लेती है । जिसके हाथ में क्षमारूपी तलवार है उसका कोई बिगाड़, अथवा अनर्थ नहीं कर सकता । क्षमा ही उत्तम शांति है । विद्या ही एक परम तृप्ति है और अहिंसा ही परम सुख की खानि है। सत्य, दान, आलस्य न करना, क्षमा और धर्म ये काम मनुष्य को कभी न छोड़ने चाहिएँ । जो मनुष्य नित्य दान करता है, सब से प्रीति रखता है, देवताओं का सत्कार करता है और सदा पापों से बचता रहता है, वही पुण्यवान् है । आत्मा का ज्ञान, थकावट का न होना, सहनशीलता, नित्य धर्म करना, वाणी को वश में रखना, और दान, ये कार्य पुण्यवान ही करते हैं। जो मनुष्य धर्म के समय धर्म, अर्थ के समय अर्थ, काम के समय काम करता है, वही श्रेष्ठ है।

संसार में सत्य धर्म के अतिरिक्त और परमात्मा के नाम स्मरण के सिवा मनुष्य का हित करनेवाली और कौन सी वस्तु है ? क्या माता, पिता, भाई, बन्धु, स्त्री, पुन्न अथवा नाना प्रकार के ऐश्वर्य, और सुख देनेवाले पदार्थ मनुष्य के सच्चे हितैषी हैं ? और की तो बात ही निराली है, परंतु संसार में स्त्री पुरुष का सब से अधिक घनिष्ट संबंध और प्रेम होता