पृष्ठ:अहिल्याबाई होलकर.djvu/१२७

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के लिये आज दिन भी सरकार होलकर की तरफ से ८००) सालाना दिया जाता है।

इन धर्मसंबंधी कार्यों के लिय जगतप्रख्यात शेक्सपियर का कथन है कि धर्म उस स्थान पर पाया जाता है जहाँ पर प्रत्येक मनुष्य सें प्रीति हो, झील, ताल, कूएं आदि खुदवाए गए हों, पुल और मकान बंधवाए गए हों, छायादार वृक्ष लगवाए गए हों, जहाँ पर दु:खित मनुष्यों को कगालों और निराश्रितों के ऊपर दया आती हो, प्रवासियों के हितार्थ धर्मशालाएँ बनवाई गई हों, अन्न जल की व्यवस्था की गई हो, वस्त्र दिये जाते हों, अनाथों को औषध दिये जाते हों, और जहाँ पर पात्र अपात्र का विचार न होता हो ।

एक विद्वान् का कथन है कि दान देना, धार्मिक जीवन रखना और अपने आप्तजनों को सहायता करना ये ऐसे सत्कार्य हैं जिनकी कभी कोई निंदा नहीं कर सकता । कहा भी है-

नान्नोदक समंदानं न तिथि द्वादशी समा ।
न गायत्र्याः परोमंत्रो न मातुर्दैवत परम् ॥ चाणक्य ॥

अर्थात्—अन्न जल के समान कोई दान नहीं है । द्वादशी के समान तिथि और गायत्री से बढ़ कर कोई मंत्र नहीं है और न माता के समान कोई देवता ही है।

जिस समय बाई ने ये देवस्थान, अन्नसत्र और धर्मशालाएँ बनवाई थीं, उस समय वस्तु और दूसरी सामग्री का तो क्या कहना, मनुष्य मात्र को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचना बहुत दुर्लभ होता था । तो फिर इतनी बड़ी शिलाएँ और दूसरे सामान संपूर्ण भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक भेजवाने