पृष्ठ:अहिल्याबाई होलकर.djvu/१२

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पाकर यही जान लिया था कि वह घर को ही लौट गया है, परंतु अब ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी छायादार वृक्ष की छाया में कदाचित् लेटा रहा हो, मैं भोजन से निवृत्त हो अभी तुम्हारे साथ चलकर हम दोनों उसे खोज लेते हैं, और तब तक तुम भी भोजन से निवृत्त हो जाओ। परंतु माता का प्रेम विचित्र और अकथनीय, निस्वार्थ और स्फटिक के तुल्य होता है। जिस माता ने कठिन से कठिन व्रत कर, नाना प्रकार के स्वादिष्ट पदार्थों का परित्याग कर और प्रसवकाल के अत्यंत कठिन दु.ख को सहनकर पुत्रसुख अनुभव किया हो, अपने सर्व सुखों को तिलांजलि देकर केवल अपने पुत्र को सुखपूर्वक पालन करने का निश्चय किया हो, स्वयं शीत और उष्ण काल के दुःख को भोग अपने पुत्र की रक्षा की हो, जिसने अपने आहार में से भी बचा कर अपने पुत्र के लिये रख छोड़ने का संकल्प किया हो, क्या उसके मन में अपने पुत्र को भूखा जान स्वयं भोजन करने का विचार हो सकता है ? मेरा बच्चे खेत में ही भटकता होगा या भूख के मारे व्याकुल हो शिथिल हो गया होगा अथवा जंगल के हिंसक पशुओं का कलेवा हो गया हो इत्यादि नाना प्रकार के प्रेमयुक्त विचारों से अत्यत व्याकुल हो मल्हारराव की माता अपने साथ रोटी और पानी का भरा बर्तन लेकर नई प्रसूता गौ की भांति भूखी और प्यासी खेत की ओर, शीघ्र चलने लगी।

जिस स्थान पर मल्हारराव सोए हुए थे वह स्थान खेत के एक कोने में छोटी छोटी झाड़ियों से घिरा हुआ था। यहां