पृष्ठ:अलंकारचंद्रिका.djvu/८४

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50 अलंकारचंद्रिका २०-पयायोक्ति दो०-पर्यायोक्ति प्रकार द्वै कछु रचना सों बात । मिस करि कारज साधिये जो हित चितहिं सोहात ॥ [१]-"कछुरचनासी बात"-जो बात कहनी हो उसे सीधे शब्दों में न कहकर कुछ धुमाफिराकर कहना [ कोई-कोई इस अलंकार में व्यंग्य मुख्य मानते हैं, परंतु हम ऐसा नहीं मानते] । जैसे-कहना हो कि 'अमुक व्यक्ति मर गया' इस बात को इन्हीं शब्दों में न कहकर यों कहो कि "अमुक व्यक्ति को सुरराज ने अपने पास बुला लिया" यह पर्यायोक्ति है। सीधे यह न कहक, कि "भाऊसिंह हरिभक्त हैं" मतिराम जी कहते हैं- दो०-जाके लोचन करत हैं कुवलय कंज प्रकास । सो भाऊ भूपाल के करत हिये में बास ॥ पुनः-कत भटकत गावत न क्यों वाही के गुनगाथ । जाके लोचन ही किये बिन बलयान रतिहाथ ॥ यहाँ स्पष्ट शब्दों में यह न कहकर कि 'शंकर का भजन कर' यों कहा कि क्यों भटकता फिरता है, उसीके गुणगाथ क्यों नहीं गाता जिसके नेत्रों ने रति के हाथों को विना कंकण के कर दिया [अर्थात् काम को जलाकर रति को विधवा कर दिया था। पुनः-दो०-सीताहरन तात जनि कहेउ पिता सन जाय । जो मैं राम तो कुल सहित कहहिं दसानन आय ॥

  • इस अलंकार को अंगरेजी में 'पेरोफ्रेसिस' [ Periphrasis ]

कहते हैं।