पृष्ठ:अलंकारचंद्रिका.djvu/२६

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[ दूसरा प्रकाश] अर्थालंकार १-उपमा अर्थालङ्कारों में सर्वोत्तम और अनेक अलङ्कारों का मूल उपमा अलङ्कार है। इसी से इसे पहले लिखते हैं। दोहा -रूप रंग गुन काहु को काहू के अनुसार । तासों उपमा कहत हैं जे सुबुद्धि प्रागार ॥ जाको बरनन कीजिय सो उपमेय प्रमान । जाकी समता दीजिये ताहि कहिय उपमान ।। उपमेय रु उपमान में समता जहि हित होय । सो साधारन धर्म है कहत सयाने लोय ॥ सो, से, सी, इव, तृल , लों, सम, समान उर आन । ज्यों, जैसे, इमि, सरिस, जिमि, उपमावाचक जान ।। कहीं-कहीं "रंग, नाई, न्याय और मतिन" भी वाचक होते हैं। विवरण-जब दो वस्तुओं में हुए भी कोई समता वर्णन की जाय तव उपमा अलंकार होता है। समता प्राकृति, रंग और गुण की होनी चाहिये । वर्णन करने में जिसकी पृथकता रहते

  • अगरेजी में इस अलंकार को 'सिमिली' (Simile ) और फारसी तथा

उर्दू में 'तशबीह' कहते हैं 1