पृष्ठ:अमर अभिलाषा.djvu/३३५

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

उपन्यास ३२७ भद्र पुरुष श्यामापा थे । उन्होंने भी पहचान लिया, भिखारिणी पही खी है, जिसे उन्होंने दो वर्ष की सजा दी थी। वह भव भी गालियाँ पक रही यो। सामाबापू के साथ सुशीला थी, और उसकी गोद में कमास का शिशु था। वह अवाक् सय देख रही थी। भिसारिणी की रष्टि सुशीला पर पड़ी । यह शाखें गवा-गदा- पर उसे देखने लगी। इसके बाद वह हाद उठ खड़ी हुई, और नीता की ओर देखफर जोर से बोली-"अरे! तु दजी की छोकरी-तेरे ये डा!" सुशीला पहले तो डर गई, पी पहचान लिया-यह भान्य- हना वही सी है, जिसने एक बार उसे फुलसाना चाहा था। पुलिस-फॉन्टेविल ने भद्र पुल्प का परिचय चौर संकेत पाफर मिसारिणी को पकड़ लिया। भीड़ और भी पद गई थी। महिला ने श्यामायाबू के पास जाकर कहा-"आपने इसे कुछ फष्ट दिया था?" "मैं मैजिष्ट्रट हूँ । कन्या चुराने और उनसे बुरा फर्म कराने के अपराध में मैंने इसे दो वर्ष का दण्ड दिया था।" "भय इसे क्षमा कर दीजिये, इमसे अधिक इसकी क्या दुर्दशा हो सकती है?" सुशीला ने कहा-"मैं इसे जानती हूँ, यह भले घर की लड़की है । प्राह ! इसका सुन्दर रूप अब भी मेरी आँखों में है । प्रकाश माई......