पृष्ठ:अमर अभिलाषा.djvu/३०७

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उपन्यास इतना कह, उसने एक धका भगवती को दिया। धमा खाकर भगवती गिरी नहीं, दरी भी नहीं। वह भयङ्कर रूप से दाँत किटकिटाकर हरगोविन्द पर तपकी, और उसने उसका गला ऐसे ज़ोर से दवा लिया, कि वह गिरकर छटपटाने लगा। भग- वती उसके ऊपर चढ़ बैठी। उसकी आँखें निकल पायीं, नीम निकल पड़ी। इसके थनन्तर उस चण्डिका ने उसके कपड़ों को फाड़ना और जगह-जगह दांत से काटना शुरू कर दिया। वह अभागा पापी पाप के हथियार से पाप का दण्ड पाकर तड़पने लगा। टूटने की बहुत कोशिश की, पर नाहरी से पार न पा- सका । अन्त में वे-दम होकर पड़ा रहा । अब भीमाकृति चण्डिका उसके ऊपर से उतरी । अव भी खून उसके सिर चढ़ रहा था , यह बड़बडाती इधर-से-उधर पैर पटककर घर में फिरने लगी। पर शोध की मात्रा कम न हुई। वह दाँत कटकटाकर दोनों हाय भीच-भींचकर कुत्सित गालियाँ बकने लगी। तब भी शान्त न हुई । वह फिर भभकी । अब की बार लैम्प उसके हाथ में था- गया, उसे उसने लपककर उठा लिया, और एक यार बोलकर इस ज़ोर से अशक्त हरगोविन्द के ऊपर देमारा, कि वह एकदम 'हाय' कर उठा । चिमनी टूट गई, तेल बिखर गया, भाग लग गयी। अव हत्यारी, राक्षसी अपने यथार्थ वेश में घर से बाहर निकलकर अन्धकार में लीन होगयी। इसके योड़ी ही देर में गांववालों ने कोलाहल सुन, और नागकर देखा-हरगोविन्द का घर घाय-धाय जल रहा है।