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"किसी का हो!" कैसा उत्तर ! कनक कुछ संकुषित हो गई। अपने जीवन पर सोचने लगी। खिन्न हो गई। माता की बात याद आई। वह महाराज-कुमारी है। आँखों में साहस चमक उठा। राजकुमार तमककर खड़ा हो गया। दरवाजे की तरफ चला। कनक वहीं पुतली की तरह, निकि, अनिमेष नेत्रों से राजकुमार के आकस्मिक परिवर्तन को पढ़ रही थी। चलते देख स्वभावतः बढ़कर उसे पकड़ लिया। "कहाँ जाते हो?" "छोड़ दो। "क्यों ? "छोड़ दो।" राजकुमार ने झटका दिया । कनक का हाथ छूट गया । कलाई दरवाजे से लगी। चूड़ी फूट गई। हवा में पीपल के पत्ते की तरह शंका से हृदय काँप उठा । चूड़ी कलाई में गड़ गई थी, खून आ गया। राजकुमार का किसी भी तरफ ध्यान नहीं था, वह बराबर बढ़ता गया। कलाई का खून झटकती हुई बढ़कर कनक ने बाहों में बाँध निया-कहाँ जाते हो? कनक फूट पड़ी, आँसुओं का तार बँध गया । निरशब्द कपोलों से बहते हुए कई बूँद आँसू राजकुमार की दाहनी भुजा पर गिरे। राजकुमार की जलती आग पर आकाश के शिशिर-कणों का कुछ भी असर न पड़ा। "नहीं खाओगे?" "आज रही, बहुत-सी बातें हैं, सुन लो, फिर कभी न आना, मैं हमेशा तुम्हारी राह छोड़ दिया करूंगी।"