पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/७७

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धोया अभ्यास : मानकर्मसंन्यासयोग इस प्रकार कर्मके साथ जिसने ब्रह्मका मेल साधा है वह ब्रह्मको ही पाता है। २४ देवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते । ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥२५॥ इसके सिवा कितने ही योगी देवताओंका पूजनरूपी यज्ञ करते हैं और कितने ही ब्रह्मरूप अग्निमें यज्ञद्वारा यज्ञको ही होमते हैं। २५ श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये सयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ।।२६।। और कितने ही श्रवणादि इद्रियोंका संयमरूप यज्ञ करते हैं और कुछ शब्दादि विषयोंको इंद्रियाग्निमें होमते हैं। टिप्पली-सुननेकी क्रिया इत्यादिका संयम करना एक बात है और इंद्रियोंको उपयोगमें लाते हुए उनके विषयोंको प्रभुप्रीत्यर्थ काममें लाना दूसरी बात है, जैसे भजनादि सुनना। वस्तुतः तो दोनों एक हैं। सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥२७॥ और कितने ही समस्त इंद्रियकर्मोको और प्राण- कर्मोको ज्ञानदीपकसे प्रज्वलित की हुई आत्मसंयमरूपी योगाग्निमें होमते हैं। २७