पृष्ठ:अनासक्तियोग.djvu/५०

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अनासक्तियोग और यदि मृत्युकालमें भी ऐसी ही स्थिति टिके तो वह ब्रह्मनिर्वाण पाता है। ७२ ॐ तत्सत् इति श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद अर्थात् ब्रह्म- विद्यांतर्गत योगशास्त्रके श्रीकृष्णार्जुनसंवादका ‘सांख्य- योग' नामक दूसरा अध्याय । कर्मयोग यह अध्याय गीताका स्वरूप जाननेकी कुजी कहा जा सकता है। इसमे कर्म कैसे करना, कौन कर्म करना और सच्चा कर्म किसे कहना चाहिए, यह साफ किया गया है और बतलाया है कि सच्चा ज्ञान पारमार्थिक कर्मों में परिणत होना ही चाहिए। अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन । तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ १॥ अर्जुन बोले- हे जनार्दन ! यदि आप कर्मकी अपेक्षा बुद्धिको